3 क्रोध से अपना और दूसरों का अनिष्ट

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

          *३*

*क्रोध से अपना और दूसरों का अनिष्ट ही होता है*

   क्रोध को भी हम जीतें। क्रोध अपने से कमजोर पर आता है। हमारा रोष निकलेगा बच्चों पर, नौकरों पर तथा जिनसे हमें हानि की सम्भावना नहीं है, उन पर। किंतु जिसके निमित से क्रोध निकला हो; उसकी उस बुराई को तो वह दूर करने से रहा, उल्टे एक बार वह बुराई दबकर अन्तश्चेतना में वापिस जाकर गहरी बन जाएगी। अतएव क्रोध से अपना और दूसरे का अनिष्ट ही होता है।

        सोचें, क्या हमने सबके मंगल का ठेका ले रखा है और हमारे क्रोध करने से ही उसका मंगल हो जाएगा ? उसकी बुराई मिट जाएगी ? किंतु यह भ्रम है कि मैं डाँट-डपटकर किसी को सुधार लूँगा। अपने बच्चों पर हम प्यारभरा शासन कर सकते हैं, पर उसमे क्रोध की गंध भी नहीं आनी चाहिए। हम जान भी नहीं पाते, उन-उन अवसरों पर उन बच्चों का, नौकरों का सुधार तो होता नहीं, उल्टे हमारी आस्तिकता की नींव भूकम्प की भाँति हिलने लगती है, जो अभी-अभी आगे आनेवाली विपत्तियों में हमें और भी खिन्न बना देती है। इस दोष को सर्वथा सर्वांश में जितना शीघ्र-से-शीघ्र हम कुचल सकें, कुचल डालें। नहीं तो, उपासना का प्रासाद इस वर्तमान नींव पर निर्मित नहीं हो सकेगा। क्रोध की गंध भी उस उपासना के महल की दीवालों में दरार डाल देती है। अतएव खूब सावधानी से व्रत लेकर इस दोष पर हम काबू पावें।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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