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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *३०*

*भगवान की कृपा चाहत करने पर ही प्रकाशित होती है*

        सोचे---एक-ना-एक दिन इस शरीर से हमारा सम्बन्ध छूठ ही जायगा फिर भी अपनी मूर्खता क्यों होती है कि इसके पीछे भगवान् ही हमसे छूट जाते हैं। यहाँ कोई भी चीज ऐसी नहीं जिससे हमारा कुछ भी सम्बन्ध रहे ;  फिर भगवान को छोड़ना तो महान मूर्खता है। 

           भक्त लोग एक काम किया करते हैं--वह भगवान से अपना कोई सम्बन्ध जोड़ लेते हैं अर्थात *'भगवान मेरे स्वामी हैं, मैं उनका दास हूँ', 'भगवान मेरे सखा हैं, मैं उनका मित्र हूँ', 'भगवान मेरे पुत्र हैं, मैं उनका पिता या उनकी माता हूँ', भगवान मेरे पति हैं, मैं उनकी पत्नी हूँ',  भगवान मेरे प्रेमास्पद हैं,मैं उनकी प्रेयसी हूँ'*, कहने का मतलब यह है कि जो सम्बन्ध बहुत प्यारा लगे उसे मानकर ठीक उसी के अनुसार चौबीसों घंटे व्यवहार करना शुरू कर दें ; फिर भगवान जल्दी या देर से उसके इसी सम्बम्ध को मानकर उसे प्रकट कर देते हैं अर्थात ठीक-ठीक उसे यह अनुभव होने लगता है कि *भगवान मेरे यही हैं।* 
 
        *यही बात संत लोग कहते हैं और यही सभी वैष्णव शास्त्रों का निचोड़ है ऐसा करने से होता यह है कि फिर मन को जबरदस्ती चौबीस घंटे बार-बार सेवा के लिए भगवान के सामने जाना पड़ता है और फिर धीरे-धीरे वह बिल्कुल तन्मय हो जाता है जैसे कोई भगवान का सखा है तो वह सुबह उठने से लेकर रात में सोने तक श्रीश्यामसुंदर के साथ अथवा भगवान् श्रीराम के साथ रहेगा। भगवान खायेंगे, तब वह खायेगा, नहायेंगे, तब नहायेगा ; खेलेंगे, तब खेलेगा ; तब सोयेगा। कभी वन में घूमेगा, कभी घर में रहेगा,  खेलेंगे तब खेलेगा ; सोयेंगे, तब सोयेगा। कभी वन में घूमेगा, कभी घर में रहेगा, कभी कुछ खेल कभी कुछ खेल--इस प्रकार दिन-रात मन से तो वहाँ लगा रहेगा, तथा बाहरी रूप से निरन्तर नाम लेता रहेगा, गुण-लीला आदि सुनता रहेगा।* जब इस प्रकार मन की साधना तत्परता से चलती है और तब भगवान की कृपा से मन लगना कोई बड़ी बात नहीं है।

         पर जब हम स्वयं-- *'हुआ तो हुआ नहीं हुआ तो परवा नहीं'* इस प्रकार की मुद्रा रखते हैं तो भगवान को भी गरज तो है ही नहीं कि वह हमारे पीछे पागल होकर घूमते रहे। यद्यपि भगवान किसी साधन के द्वारा मिलते नहीं मैं जब भी मिलते हैं तो अपनी कृपा से ही मिलते हैं, मन भी उनमें लगता है तो उनकी कृपा से ही लग सकता है, पर चाह तो हमको करनी पड़ेगी। यदि हम नहीं चाहे तो बिना चाहे हमारा मन लग जाए तो बेचारे एक मिल में काम करने वाले मजदूर ने क्या अपराध किया है कि उसका मन ना लगे ? क्योंकि भगवान् के लिए तो सब समान हैं। इसलिए *शास्त्रों में यह बात कही जाती है कि 'भगवान की पूर्ण कृपा सब पर सर्वथा समान रहती है पर वह चाह करने पर ही प्रकाशित होती है।'* 

            यह ठीक है कि जिससे सत्संग--सच्चे महापुरुष का संग--मिल गया है उसे श्रीभगवान् की कृपा का दर्शन होने की बात निश्चय हो गई है ; पर यदि हम कुछ तत्परता दिखायें तो इससे भी जल्दी हो जाय।

          श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं-- *"सनातन ! बिना महापुरुषों की कृपा हुए किसी को भक्ति मिल ही नहीं सकती। श्रीकृष्ण-भक्ति की प्राप्ति तो ऊँची बात है, बहुत दूर की बात है, भवबन्ध का नाश भी बिना महापुरुष की कृपा हुये हो ही नहीं सकता। सभी शास्त्रों में 'साधुसंग-साधुसंग' बस, यही बार-बार कहा गया है। यदि लवमात्र के लिए भी साधुसंग प्राप्त हुआ हो तो फिर सभी काम निश्चय सिद्ध हो जाते हैं।"*

      फिर आगे चलकर कहते हैं-- *"जब मनुष्य का कोई अत्यन्त सुन्दर भाग्य जाग उठता है तब उसमें पहले भगवान के प्रति टान होती है और तब वह महापुरुषों के संग में जा पहुँचता है महापुरुष का संग होते ही उसके द्वारा भजन की क्रिया--अर्थात श्रवण-कीर्तन आदि होने लगते हैं। श्रवण-कीर्तन होते-होते सभी दोष दूर हो जाते हैं और सभी दोष दूर होने पर भक्ति में निष्ठा उत्पन्न होती है। निष्ठा होने पर तब भगवान के गुण-लीला आदि के श्रवण-कीर्तन में रुचि उत्पन्न होती है। रुचि होने के बाद उसमें अत्यन्त आसक्ति हो जाती है। आसक्ति होने पर फिर मन में भगवान के प्रति प्रीता का अंकुर उत्पन्न होता है। यही प्रीति का अंकुर जब गाढ हो जाता है तो इसे 'प्रेम' कहते हैं और यही सभी आनन्द को देने वाली वस्तु है।"*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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