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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*पापों को यथाशक्ति छोड़ते हुए तत्परता से भजन में लगे*
हमारे मन में जो प्रभु को पाने की अभिलाषा उठती है वह बड़ी ही सुन्दर है पर इसको बड़ी सावधानी से जैसे पेड़ में धीरे-धीरे जल देकर उसे पाला जाता है उसी प्रकार इस अभिलाषा को भी पोष्ट करना पड़ेगा। इसकी सबसे पहली सीढ़ी है--भगवान की कृपा का भरोसा करके सब प्रकार के पापों का सर्वथा त्याग कर देना। पाप करने से केवल हमारा ही सर्वनाश होगा इतना ही नहीं ; उस पाप में जो जो सहायक होंगे उन सब का सर्वनाश होगा। मूर्खतावश लोग इसको समझते नहीं। पिता, भाई, माँ--किसी के भी कहने से पाप किया जाय, उनके सहित पाप करने वाले का सर्वनाश हो ही जायगा। *'इसलिए शास्त्र में यह बात आती है कि यदि माता-पिता भी पाप की आज्ञा दे तो उसका पालन ना करें।'* अतः यदि सचमुच प्रभु को पाकर उसके कृतार्थ होना चाहते हैं तो सबसे पहले मन को कड़ा करके सब प्रकार के असत्य,झूठ, चोरी, व्यभिचार, हिंसा आदि पापों का सर्वथा त्याग करते यह पहली सीढ़ी है इसके बिना ऊपर चढ़ना बड़ा कठिन है। हम निश्चयपूर्वक छोड़ना चाहेंगे तो स्वयं प्रभु हमारी सहायता करेंगे, पूर्ण सहायता करेंगे। हमारा यह निश्चित होना ही चाहिए कि *'प्राण भले ही चले जायँ, पर पाप नहीं करुँगा।'* इसी निश्चय के साथ जोर से भजन शुरू कर देना चाहिये--यह दूसरी सीढ़ी है। *निश्चय पूरा नहीं होता इसलिए भूल से पाप फिर भी हो सकते हैं, पर यदि भजन चलता रहे तो अपने-आप आत्म-बल आयगा और प्रभु की कृपा से सभी पाप छूट जायँगे। पर मन में यह निश्चय होना चाहिए कि 'मुझे पाप नहीं ही करना है।'*
इस प्रकार पापों को छोड़कर भजन करने पर जिस दिन भजन में मन लगेगा, उसी दिन से अपने-आप भगवान् की एवं महापुरुषों की महिमा समझ में आने लगेगी। उसके पहले सुनी-सुनाई बात को ही हम अपना आधार मानकर चलें। *वास्तविक भगवान क्या है और महापुरुष क्या है यह बात अन्तःकरण सर्वथा पवित्र होकर जब निरन्तर सहज प्रेम पूर्वक भजन होने लगता है, तभी समझ में आती है।* इससे पहले हमारी जो कल्पना है उनके बाहर के रूप की है असली बात ना कोई बता सकता है और ना सुनकर समझ में आ सकती है।
किसी भी सच्चे संत के विषय में हमने जो कुछ भी सुना है और जो कुछ भी कल्पना करते हैं, उनके बाहर के रूप की बात है। उनका वास्तविक स्वरूप बिना भजन किए ना तो हम समझ सकेंगे और ना उनसे पूर्ण लाभ ही उठा सकेंगे। *भगवान की कृपा, भक्तों की कृपा एवं भजन इन तीनों बातों के सिवा और किसी प्रकार से भगवान् को तथा भक्त को समझना असम्भव है। पर भगवान और भक्त की पूर्ण दया है--हम बिल्कुल ठीक मानें। इस दया का अनुभव केवल भजन के द्वारा हो सकता है ; इसके सिवा दूसरा उपाय नहीं है। सच्चे संत के विषय में किसी से भी बहुत ऊँची-ऊँची बातें सुन सकते हैं पर उनको समझना अथवा उनसे लाभ उठाना केवल भजन के द्वारा ही हो सकता है संत के विषय में आपको जो कुछ भी कोई कहते हैं वह सब का सब उनके बहुत तुच्छ स्वरूप का ही वर्णन है, वे इन सब की अपेक्षा बहुत ऊँचे हैं। फिर स्वयं भगवान या संत बिना संकोच समझायेंगें।* जो बात सुनने को मिले--कोई भी कहे सुने लें, पर असल में लाभ उठाने की इच्छा हो तो पापा को यथाशक्ति सर्वथा छोड़ते हुए तत्परता से निरंतर भजन में लगे। फिर बिना किसी के बताये, बिना किसी के सुनाये हम सब बात समझ जायँगे। स्वयं भगवान गरजकर के हमको समझायँगे। सच्चे संत के सम्बन्ध की बातें समझाने की नहीं हैं। यदि कोई किसी को समझाने चले तो कभी-कभी लाभ के बदले हानि हो सकती है। घी बहुत अच्छी चीज है, पर संग्रहणी की बीमारी में अवगुण करता है। इसलिए मन में जबतक मन में पाप है, तब तक प्रेम की ऊँची ऊँची बातों को सावधानी से सुनना चाहिये। संत के सम्बन्ध की बातों का भी फल उल्टा हो सकता है।
*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू*
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