32

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *३२*

*नाम लेने से ही भगवान एवं महात्मा दोनों प्राणों से बढ़कर प्यारे लगने लग जायँगे*

     निरन्तर भगवान् का जप लीजिए। कोई भी आवे कम-से-कम बोल कर उसका सत्कार कर दीजिए, फिर कंजूस के धन की तरह एक-एक क्षण नाम में लगाइये। इसके बिना महात्माओं का सच्चा रूप समझ में आना कठिन है। जितना अधिक भजन कीजियेगा, उतना ही अन्तःकरण में भगवान् एवं महापुरुषों का सच्चा रूप चमकेगा। *एक ही दवा है--निरन्तर नाम जप।* जहाँ तक हो, कान से नाम सुनिये।

          *सत्संग का फल है--भजन, भजन का फल है-- सत्संग।* ये दोनों क्षण-क्षण में बढ़ते रहने चाहिये। सारी कमी भजन की है। यों तो भगवान एवं महापुरुष जब चाहे, उसी क्षण वे आपको अपने समान बना ले सकते हैं, पर यदि आपको बना लें तब फिर भजन करने वाले के प्रति अन्याय होगा, जो दिन-रात भगवान का नाम लेकर, उन्हें याद करके आँसू बहाता है, उसका सम्मान कम हो जायगा ।

        संत की कृपा पूर्ण है। अन्तःकरण मलिन होने के कारण ही हम लोग उसे समझ नहीं पाते। नाम लेने से जैसे-जैसे अन्तःकरण शुद्ध होगा, वैसे ही भगवान एवं महात्मा दोनों प्राणों से बढ़कर प्यारे लगने लग जायँगे, और फिर संत का संग इतना अधिक प्यारा लगेगा, कि वियोग की सम्भावना से ही प्राण सूख जायँगे, अभी अमुक-अमुक  स्थान प्यारे लगते हैं, फिर रात दिन वही स्थान प्यारा होगा जहाँ महापुरुषों का चरण टिकता है। 

        *आप में जितनी शक्ति हो, उतनी-उतनी पूरी शक्ति लगा कर निरन्तर भगवान का नाम लेने की चेष्टा कीजिए, पूरा तो उनकी कृपा से ही होता है।*

भगवान श्री कृष्ण ने स्वयं कहा है--
*श्रद्धया हेलया नाम रटन्ति मम जन्तवः*
*तेषां नाम सदा पार्थ वर्तते हृदये मम*
'हे अर्जुन! चाहे श्रद्धा से या बिना श्रद्धा के ही--उपेक्षा में मेरे नाम की रट लगाने वाले का नाम मेरे हृदय में सदा वर्तमान रहता है।'

         *भागवत में आया है--जिसके मुँह में, हे भगवान! तुम्हारा नाम है, उसने सब तपस्या कर ली, सब यज्ञ कर लिए, तीर्थ स्नान कर लिया, सब गुणों का संयम कर लिया, यहाँ तक कि वेद पारायण भी उसने कर लिया।'*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157