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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *३४*

*जीभ से निरन्तर नाम लीजिए मन से निरन्तर उन्हें ही याद कीजिए और पाप से मृत्यु की तरह डरिए*

           *छोटी-मोटी टान (आकर्षण), सत्संग, भजन दोष की निवृत्ति, निष्ठा, रुचि, आसक्ति, प्रीति का अंकुर एवं प्रेम--ये नौ सीढ़ियाँ हैं।* इसमें हम लोग तीसरी सीढी पर हैं, और उस पर भी अपना पाँव ठीक से नहीं जमाते। इसलिए हम लोग चौथी सीढी, अर्थात *'सब दोषों से मुक्ति'* प्राप्त नहीं कर पाते। अतएव भजन करना है। खूब ठीक से मन लगाकर श्रवण, कीर्तन, स्मरण, जप का तार निरन्तर चले। फिर आगे का काम तो अपने-आप सब हो जाएगा ।

     *खूब भजन कीजिए, यही मृत्यु से बचने का उपाय है। नहीं तो मृत्यु तो मृत्यु तो एक दिन आयेगी ही। वह मृत्यु ही अन्तिम मृत्यु हो--उसके बाद फिर मरना ही ना पड़े--ऐसा उपाय बुद्धिमान को करना चाहिए।* इसमें कोई परिश्रम नहीं है। भगवान भक्त-वाञ्छा-कल्पतरू हैं। उनसे जो चाहिए,वहीं वे देंगे। सामने मृत्यु खड़ी हो ऊपर से बम के गोले पढ़ते हों, पर, सच मानिए, यदि आप उन्हें हृदय से पुकारे की 'हे प्रभु ! मुझे बचा लो' तो फिर बम के गोले व्यर्थ हो जायँगे--उसी क्षण जबकि कलकत्ता जलता रह सकता है। आपकी देह को एक चिंगारी भी स्पर्श नहीं करेगी। बिल्कुल ऐसा हो सकता है, पर होगा विश्वास करके, उनके चरणों में अपने को सौंपकर, उनका ही एकमात्र भरोसा करके, उनको याद करने से।

            वे चाहते हैं एक बात--देखते हैं केवल यही कि सच्चा विश्वास है कि नहीं। विश्वास होने पर वे सब कर देते हैं। इसी प्रकार धन चाहिए तो एक क्षण में आपको करोड़पति, अरबपति, असंख्यपति बना सकते हैं। पर यहाँ भी वे देखेंगे कि 'इसका विश्वास हम पर है कि नहीं। धन चाहता है, कोई बात नहीं'-- पर यह हमसे चाहता है कि नहीं। ठीक मानिए केवल उसी चाहने पर अर्थात 'प्रभु ! मैं तो आपसे लूँगा' यह ठीक चाहने पर वे परीक्षा करके देखेंगे। यदि आप डिगते हैं, तो नहीं देंगे। पर यदि पास हो जायँगे, तो उसी क्षण सुदामा की तरह धन देकर आप को कृतार्थ कर देंगे। इसी प्रकार ज्ञान चाहिये, ज्ञान देंगे। मोक्ष चाहिए, तो मोक्ष देंगे और भगवत्प्रेम चाहिए, तो भगवत्प्रेम देंगे। मतलब यह है कि किसी भी प्रकार से एक बार उनका पल्ला पकड़ लीजिये तो फिर सारी कामना मिटाकर, सबसे ऊँची चीज अपना प्रेम ही आपको देंगे। *इसलिए किसी भी प्रकार से हो--सकाम-निष्काम, जीभ से निरन्तर नाम लीजिये, मन से निरन्तर उन्हें याद कीजिए और पाप से मृत्यु की तरह डरिए। बचने की पूरी चेष्टा कीजिए, यही तीन काम करने चाहिए।*

          *            *            *
    
       कलयुग का समय ही कुछ ऐसा है कि भजन की प्रवृत्ति घटती जा रही है और बिना नियम काम होता नहीं। जो भी कहता है कि हमसे भजन होता नहीं उसे चाहिए कि वह नियमित संख्या में जप हुए, बिना भोजन ना करने का नियम दृढ़ता से पकड़ ले फिर भजन होने लग जाएगा। अर्थात् अपने कामकाज का हिसाब देखकर यह निश्चय कर ले कि हमें इतनी माला फेरनी है अब किसी का का मुलाहिजा ना रख कर यह नियम बना लेना चाहिए कि *'प्रातःकाल भोजन करने से पहले इतनी माला करके ही करूँगा, चाहे कुछ भी हो जाय। फिर रात में भोजन इतनी माला और जपकर ही भोजन करूँगा तथा सोने से पहले इतनी माला जपकर ही सोऊँगा।* अब जहाँ रोटी की अड़चन लगी--दो-तीन बार भूल हुई, उपपास हुआ कि मन बदमाशी छोड़ देगा। दस मालाएँ सुबह भोजन के पहले और दस शाम को भोजन के पहले और दस सोने के पहले,  इस प्रकार तीस मालाएँ आसानी से हो सकती हैं। इतना ना हो पाए तो आठ-आठ का नियम रखकर चौबीस माला प्रतिदिन का नियम ले-लें। कुछ नियम की पाबंदी बिना आरंभ में भजन में अड़चन लग ही जाया करती है। कुछ कड़ाई से नियम बना लें, फिर भजन होने लग जायगा। मान लें प्रतिदिन यदि २० माला का नियम है, आप बना लें तो बीस तो हो ही जायँगी और बिना नियम के कभी *६४ माला* का जप भी कर लेंगे और कभी दो-चार भी नहीं होंगी।

           प्रभु की कृपा पर विश्वास होने से भजन अपने आप होने लग जायगा। पर जब तक विश्वास नहीं, तब तक मन के साथ जबरदस्ती करनी ही पड़ेगी ; नहीं तो मन की मलिनता नहीं मिटेगी और मलिनता के मिटे बिना विश्वास भी नहीं होगा। *वृत्ती ना लगने पर भी जीभ यदि  नाम उच्चारण करेगी तो  भजन हो जायगा।*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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