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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
 
                 *३५*

*संत का विश्वास पूर्वक संग करें और उनकी इच्छा के अनुसार अपना जीवन बितायें*

          मनुष्य को अपना ही मन धोखा देता है। अनादि काल से इस धोखे को मनुष्य जानता हुआ भी अनजान बना रहता है। अपनी त्रुटि, अपना दोष वह भगवान पर तथा संत पर लादना चाहता है। भगवान एवं संत का द्वार सदा-सर्वदा-सर्वदा सबके लिए उन्मुक्त है। कुछ भी नहीं चाहिए, बस, उस द्वार में प्रवेश की इच्छा होनी चाहिए। पर हम भीतर से तो संसार से चिपके रहना चाहते हैं,ऊपर से भगवान के, संत के द्वार में प्रवेश करने की इच्छा प्रकट करते हैं। बस, यही भूल है और इसी भूल को मन ऐसे सुन्दर ढंग से सामने रखता है कि मनुष्य भूल ही जाता है। तरह-तरह युक्तियों के फेर में पड़ कर यह उद्गार प्रकट करता है--'कि क्या करूँ, मेरी परिस्थिति ही ऐसी है कि मैं सत्संग से वंचित हो रहा हूँ।' वह यह कभी भी विचार नहीं पाता 'अरे मन! तू व्यर्थ क्यों ठगता है, तू चाहता तो है नहीं और बातें बनाता है।' हम लोगों के साथ यही बात है, हमारा मन हमको धोखा दे रहा है। हमारा मन तरह-तरह के कर्तव्य सामने रक्खेगा और संत के संग से आपको वंचित रखने की चेष्टा करेगा। इसका इलाज या तो हम कर सकते हैं अथवा भगवान। भगवान की अहैतुकी कृपा से जब किसी दिन संसार का मोह भंग होगा, तब दिखेगा कि मनुष्य का एक ही कर्तव्य है--भगवान से प्रेम करना अथवा सन्त से प्रेम करना। बस,  इस प्रेम में साधक बनकर संसार रहे, तब तो ठीक, नहीं तो अपने हाथ से इसमें आग लगा देना है। इससे पहले बिना पेंदी के लोटे की तरह कभी इधर कभी उधर लुढ़कना है। 

            भगवान की कृपा आश्रय लेकर हम संत का विश्वास पूर्वक संग करें और उनकी इच्छा के अनुसार अपना जीवन बितायें। पर यह होगा हमारे किये। हम अपनी इच्छा छोड़कर प्रभु इच्छा के आगे सिर नवायें। इसी के लिए संत की शुद्ध सहायता की आशा रखें। संत को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने की इच्छा भी पूरी तरह से मिटा कर उनकी इच्छा के अनुसार चलने की चेष्टा करें। देखें, एक लौकिक साधारण माँ भी अपने छोटे बच्चे को उस काम के लिए आज्ञा नहीं देती, जिससे बच्चा नहीं कर सकता फिर भगवान या संत के द्वारा तो यह असम्भव है। आप ऐसी कल्पना ही करना छोड़ दें, कि वह मुझे वह काम करने को कहेंगे, जो मैं कर नहीं सकता। निश्चय मानिए, वे वही करने को कहते हैं, कहेंगे जो आपकी शक्ति के अन्दर, आपके द्वारा संभव है। यह नहीं करके यदि आप हठ करेंगे कि मैं तो यही करूँगा, मुझसे यही काम होगा, दूसरा नहीं होगा, तो मुझे यही करने दीजिए, तो शान्ति मिलनी कठिन है।

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           संत हमारे हाथ के यंत्र तो है नहीं कि हम जैसे चाहे घुमाए वैसे-वैसे वे घूम जायँ। संत तो श्री कृष्ण के हाथों के यंत्र हैं। सर्वथा श्रीकृष्ण की प्रेरणा से ही वे कुछ भी करेंगे। दुनिया राजी या नाराज हो इससे उनको मतलब नहीं। इस बात को श्रीकृष्ण समझे तथा श्रीकृष्ण की परम इच्छा मंगलमय है। उनके यहाँ भूल भी नहीं, पक्षपात भी नहीं आता। यदि हम संत से उत्तर चाहते हैं, तो इसके लिए श्रीकृष्ण के प्रति आन्तरिक सच्ची एवं व्याकुलता भरी प्रार्थना ही अचूक साधन है। वे सच्ची प्रार्थना अवश्य सुनेंगे। यदि नहीं सुनते, तो हमारी प्रार्थना में निष्कपट भाव की कमी कहीं-ना-कहीं अवश्य है। अर्थात हम जिसके लिए प्रार्थना करते हैं, उसके अन्तराल में कोई दूसरी बात छिपी हुई है, अथवा हमारी प्रार्थना की पूर्ति में ही श्रीकृष्ण ने कोई विशेष मंगल रच रखा है।

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          संत के पास आने से हमारा मन ही हमको बता दे रहा है, जब तक मलिन स्वार्थ को हम नहीं छोड़ेंगे, तब तक शान्त मन से संत के पास भी रह भी नहीं सकेंगे। सन्त किसी को ना निकालते हैं, ना बुलाते हैं। वह जो आता है चाहे--कोई भी हो--उसे अपने हृदय का आसन देते हैं। जो आसन को छोड़कर अन्यत्र सुख खोजने जाता है, उसे रोकते भी नहीं। वे हृदय का सारा द्वारा खोले रहते हैं, जो चाहे आ जाय, जो चाहे चला जाय।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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