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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *३७*

*संत के पास उनकी इच्छा के अनुसार चलने की इच्छा एवं चेष्टा ले कर रहें*

         सच्चे मन से पवित्र एवं श्रद्धापूर्ण चेष्टा करनी चाहिए कि संत का संत अधिक-से-अधिक मिलता रहे। हाँ, उनके पास हम उनके हो कर रहे, अपनी इच्छा के अनुसार उनको चलाने की हास्यास्पद चेष्टा छोड़कर उनकी इच्छा के अनुसार स्वयं चलने की चेष्टा लेकर रहें। हम अपनी इच्छा के अनुसार चलने के लिए संत को तंग करने लगते हैं, तभी श्री कृष्ण की माया हम पर फिरती है और हमारे लिए ऐस संयोग बन जाता है कि बाध्य होकर हमको संत के पास से हटना पड़ता है। यदि वास्तव में हम अपने जीवन को भगवन्मुखी बनाने की इच्छा लेकर, पर्याप्त मात्रा में विनय का भाग लेकर, सांसारिक स्वार्थ को जलाञ्जली देकर संत के पास रहने की इच्छा करें, रहने लगे तो फिर हमारा प्रारब्ध बाधा नहीं दे सकता; श्रीकृष्ण की कृपा हमारी इस इच्छा को निमित्त बनाकर हमारे लिए तुरन्त फ्लोन्मुख नवीन प्रारब्ध बना देगी तथा हमको संत के पास पवित्र संग से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

            इस पर हम एक दलील दे सकते हैं कि 'क्या संत की इच्छा के विपरीत चलने की हमारी शक्ति है ? हम तो सर्वथा उनकी रूचि के अनुसार ही चलते हैं।' पर यह दलील मन का भ्रम है अतः इसे दूर करने का प्रयत्न करना चाहिये।

 *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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