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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

          *३९*

*अपनी सारी शक्ति लगाकर मन को भगवान से तथा संत पुरुषों से जोड़ दें*

      अपनी सारी शक्ति लगाकर मन को भगवान से तथा संत पुरुष से जोड़ दें। उदाहरण के लिए खूब तेज आग जल रही है। उसमें हम कोई भी चीज डाल दें, वह चीज भले ही गंदी-से-गंदी क्यों ना हो--यहाँ तक की विष्ठा ही क्यों ना हो, आग में पढ़ते ही आग उसे अपना गुण दे ही देगी। आग में पड़नी चाहिए, फिर आग का गुण स्वाभाविक गुण ही है--अपने समान कर लेना। आग में यह गुण कहाँ  से आया ? 'श्रुतियाँ कहती हैं--भगवान से ही यह गुण आग में आया। फिर अनन्त-शक्ति-सामर्थसम्पन्न भगवान से मन जुड़ते ही भगवान का गुण हममें आ जाय, इसमें तनिक भी आश्चर्य की गुँजाइश नहीं है। यही बात संत पुरुषों की भी है ,क्योंकि शास्त्र यह बात स्पष्ट रूप से कहते हैं, कि संत और भगवान में बिल्कुल भेद नहीं है।'

             संत या भगवान में प्रेम कैसे हो ? इस प्रश्न के उत्तर में यही समझ आता है, कि संत एवं भगवान दोनों ही प्रेम के समुद्र हैं। असीम प्रेम वहाँ निरन्तर लहरा रहा है। कोई भी--चाहे उसका मन कितना भी गंदा क्यों ना हो, गंदे-से-गंदे मन को लेकर यदि भगवान से या संत से उसे जोड़ दें तो निश्चय समझिये, गन्दगी तो आप ही मिट जायगी और स्वयं ही प्रेम रूप हो जायगा। प्रेम-ही-प्रेम रह जायगा।

         संत की बात छोड़ दें, हम जिस किसी चीज से मन को जोड़ दें, उसी चीज का गुण मन में आ जायगा। अतः हमारी दृष्टि में जो सबसे ऊँचा पुरुष है, उसके साथ मन को जोड़ दें, उसके गुण हममें आ जायँगे।

            अहंकार है, तो उसे रहने दें, पर भगवान् या संत से मन जुड़ना चाहिये। फिर अहंकार को जलते देर नहीं लगती। पर वास्तव में जोड़ने की चाह नहीं है। 'किस प्रकार मन जुडें--यह चाह हो तो काम बन जाय।'

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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