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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

          *१०३*

*जैसे भी हो, जिव्हा को श्रीभगवन्नाम के उच्चारण में लगाइये*

   प्रश्न है कि सच्ची चाह उत्पन्न  कैसे हो। संतो का यह अनुभव है कि मलिन मन में शुद्ध चाह उत्पन्न नहीं होती। इसलिये सबसे पहले मन को शुद्ध करना है। मन शुद्ध करने का उपाय आजकल लिये एक ही है। वह है भगवत भजन। किंतु मलिन मन भगवद् भजन में लग जाय, यह भी कठिन है। इसलिए एक काम करें-जिव्हा से ही भजन करते जायँ, लेते जाँय भगवान का नाम। नाम में ऐसी अपूर्व शक्ति है कि अपने-आप मन लगने लगेगा। बिना श्रद्धा बिना प्रेम केवल हठपूर्वक जिव्हा को श्रीभगवन्नाम के उच्चारण में लगाइये,मन लगे तो उत्तम है, नहीं तो कोई परवाह नहीं। यदि जिव्हा ने नाम का आश्रय नहीं छोड़ा तो सब कुछ अपने आप नाम की कृपा से हो जायगा। श्रीरामकृष्ण परमहंस जी महाराज ने कहा--कोई अमृत के कुण्ड उतरकर अमृत-पान करे अथवा पैर फिसल कर गिर पड़े अथवा किसी के धकेल देने पर गिर पडे अथवा जान-बूझकर जबर्दस्ती उस कुण्ड में गिरा दिया जाय, यदि अमृत का संस्पर्श हुआ तो गिरने वाला चाहे किसी प्रकार से गिरा हो, अमर हो जायगा। उसी प्रकार श्रीभगवान के नाम से सम्बन्ध किसी प्रकार भी क्यों न हो, यह सर्वथा दुख से छुड़ाकर अत्यन्त आनन्दमय प्रभु के चरणों में ले जानेवाला है।

   इसलिये पुनः पुनः एक ही प्रार्थना है कि वाणी का संयम करें। विनोद करके क्या होगा ? क्षणभंगुर जीवन में विनोद, हँसी-मजाक का अवसर नहीं है। बहुत रास्ता तै करना है। आवश्यक काम प्रभु की सेवा समझकर करना है,  इसलिये आवश्यकतानुसार बोलने की जरूरत होने पर बोल लिया करें। ध्यान रखें कि कम-से-कम बोलकर ही काम चला लिया जाय और इसके बाद बाकी जो समय मिले,उसमें निरन्तर भगवन्नाम की ध्वनि होती रहे। धीरे-धीरे या जोर-जोर से---जैसे भी सम्भव एवं सुविधा से हो।
             इस बात कपर बडी गम्भीरता से विचर करेंगे। समय अनमोल; जो श्वास गया, वह फिर नहीं लौटेगा। भगवन्नाम के बिना गया हुआ श्वास व्यर्थ हुआ। मृत्यु का ठिकाना नहीं कि कब आकर यहाँ का खेल मिटा दे। मेरे इस कथन से किसी प्रकार निराश होने की जरूरत नहीं है। जरूरत है केवल अपनी ओर से पूरी शक्ति लगाकर भगवान को पुकारने की। हमारी शक्ति चाहे कितनी भी क्षीण न क्यों न हो, यदि भगवान् में लगा दी जाय अर्थात् भगवान् की शक्ति से संयुक्त कर दी जाय तो फिर उस क्षीण शक्ति की ताकत इतनी बढ़ जाती है कि उसके द्वारा हम अपनी बुराइयों को दूर करके सर्वदुर्लभ भगवच्चरणों को प्राप्त कर सकते हैं इसलिये भगवत्कृपा की डोरी खींचते रहें।

एक बानि करुननिधान की।
सो प्रिय जाकें गति न आनकी ।।
     *         *         *
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ ।
दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ।।
     *         *         *
ऐसी कवन प्रभु की रीति।
बिरद हेतु पुनीत परिहरि पाँवरनि पै प्रीति।। (विनयपत्रिका २१४)

            --इन वचनों पर श्रद्धा बढ़ाते रहें। संतों का कहना है कि यदि कोई सचमुच भगवत्कृपा पर निर्भर हो जाय तो फिर वह अपने आप आवश्यक साधनों से सम्पन्न हो जाता है। उसके लिये सब कुछ भगवान की कृपा कर देती है।
            
          सारांश यह है कि भगवत्कृपा और नाम को आलम्बन बनाकर जीवन केदिन बितायें। जगत् एवं जागतिक चेष्टा से अलग होने की चेष्टा करें।

           आजका वातावरण भगवन्मार्ग में किसी को प्रोत्साहन दे, ऐसी आशा कम रखियेगा। कलियुग का निरन्तर बढ़ता हुआ प्रभाव साधना करने वालों को अभिभूत कर रहा है। फिर जो भगवान् से विमुख हैं, उनकी तो बात ही क्या है। इसलिये इस मार्ग में अकेले बढ़ना होगा। रोकने वाले बहुत मिलेंगे, बढ़ाने वाले विरले। आपका मन कभी कर्तव्य के नाम पर कभी धर्म के नाम पर आपको भगवान से हटाकर जगत में लगायेगा। इसीलिये सावधान रहें।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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