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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

         *४०*

*श्रद्धा करने की इच्छा तो हमको करनी पड़ेगी और उस श्रद्धा को अचल करने का काम भगवान करेंगे*

  भगवान ने गीता में कहा है--

*यो यो यां यां तुन भक्त श्रद्धयार्चितु मिछति ।*
*तस्य तस्यचलां श्रद्धा तामेव  विद्धामयहम ।।*

     अर्थात 'जो मनुष्य जहाँ, जिस देवता में श्रद्धा करना चाहता है, मैं उसकी श्रद्धा को उसी में अचल कर देता हूँ।' भगवान के कथन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि श्रद्धा करने की इच्छा तो मनुष्य को करनी पड़ेगी और उसकी श्रद्धा को अचल करने का काम भगवान करेंगे। जब श्रद्धा अचल नहीं होती तब यह निश्चय पूर्वक समझ लेना चाहिए कि श्रद्धा की इच्छा ही नहीं हुई। यदि इच्छा हुई तो भगवान की बात क्या कभी झूठ हो सकती थी ?

    भगवान बिल्कुल भीतर की बात जानते हैं, उनके सामने कोई पोल चल ही नहीं सकती। हमारी इच्छा की तह में--बिल्कुल भीतरी तह में क्या वासना है, किस बात से प्रेरित होकर हम कौन-सी इच्छा करते हैं--इसका जितना पता भगवान को है, उतना हमको भी नहीं है। हमने इच्छा की कि हमारी किसी संत पुरुष में श्रद्धा हो जाए तो यह निश्चय समझिये--यदि वह सच्ची इच्छा है तो--अवश्य--अवश्य हमारी श्रद्धा उस संत पुरुष में भगवान कर ही देंगे। ठग पर श्रद्धा करना हम चाहे ही क्यों ? यदि भूल से हम किसी ठग को महात्मा मान ले तो, फिर यदि हमारे मन की सच्ची इच्छा महात्मा पर श्रद्धा करने की है, तो भगवान निश्चय हमको बतला देंगे। इतना ही नहीं, हमको सत्य संत से मिलाकर हमारी श्रद्धा भी उत्पन्न करा देंगे।

 *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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