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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *४२*

*'भगवान है,सर्वत्र हैं'--इस बात पर विश्वास करें।*

           'भगवान हैं, सर्वत्र हैं'--इस बात पर केवल विश्वास हो जाय। फिर 'यह अमुक व्यक्ति है' ; यह नहीं दिखाई देगा, दिखाई देगा--'यह साक्षात भगवान है।' कुछ करना थोड़े ही है, केवल विश्वास हो जाय, कि यह बात ठीक है। फिर कलम में कागज में, संसार के अणु-अणु में भगवान दिखाई देंगे--'यो मां पश्यति सर्वत्र'। पर 'भगवान हैं', इस बात को हृदय से मानने वाले बहुत थोड़े हैं। वास्तव में कमी इस बात की तो है। हम किसी स्वजन के पास बैठे हैं। अब हमारे मन में यह शंका नहीं है, कि वह स्वजन हमें नहीं देख रहा है। इस तरह भगवान के अस्तित्व में श्रद्धा हो जाने पर, निरन्तर दिखाई देगा--भगवान् मुझे देख रहे हैं, फिर पाप होना असंभव है।

 *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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