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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*भगवान भक्तवाञ्छा- कलपतरु है*
एक बात गिरह बाँधकर रखिए--'भगवान भक्तवाञ्छा-कल्पतरु हैं', अर्थात उनसे कोई भी कुछ भी चाहे, वह वही चीज उसे उसी क्षण देते हैं, और आप यदि कोई ऐसी चीज माँग बैठे, कि उसके मिलने से आप की हानि होगी तो दो बातों में से एक बात करते हैं--या तो उसके मन से उस चीज की इच्छा मिटा कर, उसके मन को शान्त बना देते हैं अथवा वह चीज देखकर साथ ही उस से होने वाली हानि से बचने का उपाय भी कर देते हैं। अर्थात जिस चीज से उसकी हानि होगी, उसके लिए यदि वह जिद कर बैठा कि 'हमें तो वह दे ही दें',--बिल्कुल बालक की तरह अड़ गया--तो फिर भगवान तो सर्वसमर्थ हैं। वे चीज भी अवश्य दे देते हैं और उससे जो हानि हो सकती है, उससे बचने का उपाय भी कर देते हैं। यही बात सब चीजों के विषय में समझनी चाहिये। भगवान के लिए लाख, करोड़, अरब रुपया देना अथवा मोक्ष देना--दोनों समान हैं ; ना तो उनके लिए मोक्ष की कोई कीमत है, ना ध्यान की। इसी प्रकार श्रद्धा चाहते ही वे श्रद्धा निश्चय करा ही देंगे। पर यह सब बातें उसी के लिए होगी, जिसका सचमुच भगवान् पर एकनिष्ठ भरोसा है ।
जिस मन की बात आप कर रहे हैं, वहीं उसी मन में भगवान हैं और वे जानते हैं कि यह क्या चाहता है। वह बिल्कुल रत्ती -रत्ती जानते हैं कि आपके मन में क्या है ? आप भी या संसार में कोई भी, नहीं जानता है कि असल में आपके मन में क्या है; पर वे ठीक-ठीक जानते हैं। और यदि आपकी चाहत सच्ची है और किसी ऐसी चीज की नहीं है, जिससे हानि होने की सम्भावना हो तो उस चाह की पूर्ति वे अभी, इसी क्षण कर दें, या चाह मिटा कर शान्ति दे दें।
आप कह सकते हैं कि 'जब वे रत्ती-रत्ती बात सुन रहे हैं, जान रहे हैं, तब वे फिर वे क्यों नहीं करते ?' इसका उत्तर यह है कि--'वे ही जाने'। सोचने से दो ही बातें समझ में आती है-- (१) -- सच्ची चाह नहीं है, (२)-- या ऐसी चाह है जिसकी पूर्ति में आपको हानि हो। तीसरी कोई बात समझ में नहीं आती। सच्ची चाह की यही पहचान है कि बस, केवल वहीं चाह रहेगी, और सब स्वाहा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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