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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*संत भगवान् के प्रतिनिधि हैं*
देवताओं के विषय में तो आप यह बात समझे कि जैसे मैजिस्ट्रेट है, कलेक्टर है, कमिश्नर है, वैसे ही वे हैं। मजिस्ट्रेट आदि का अधिकार बँधा हुआ है। इतना-इतना काम वे कर सकते हैं, उससे अधिक नहीं। उस अधिकार के अन्दर किसी के लिए वह जो चाहे कर सकते हैं, पर अधिकार के बाहर मजाल नहीं है कि वे कलेक्टर, कमिश्नर किसी को कुछ दे सकें या किसी का कुछ बिगाड़ कर सकें। वैसे ही देवताओं की शक्ति सीमित बँधी हुई है, अर्थात उनके अन्दर यह शक्ति भगवान की ओर से दी हुई है कि 'तुम लोग इतना-इतना काम कर सकते हो।' इन्द्र,अग्नि,वरुण सब देवता हैं। मान लीजिए, इनको कोई याद करता है, यदि यज्ञ ठीक-ठीक विधि विधान से पूरा हुआ, तो इनकी जितनी शक्ति है उसके अनुसार उस यज्ञ का पूरा-पूरा फल दे देंगे, पर सभी चीज वे नहीं दे सकते। संत महापुरुष तो भगवान के प्रतिनिधि हैं। बादशाह के प्रतिनिधि को यह पूरा पूरा अधिकार रहता है कि वे राज्य में जो चाहे वही कर सकता है। बादशाह की तरह ही उसकी शक्ति होती है तथा उसकी आज्ञा का पालन राज्य के समस्त बड़े से बड़े अधिकारी कर्मचारियों को करना पड़ता है, नहीं करेंगे तो वे हटा दिए जायँगे। संत भगवान का प्रतिनिधि होता है, वह चाहे जो कर सकता है। उसका प्रत्येक वचन भगवान का वचन है। उसकी कही हुई प्रत्येक आज्ञा भगवान की आज्ञा है ।
संत की पहचान असम्भव है; पर दो कसौटियाँ हैं, जिन पर कसकर चलने से पछताना नहीं पड़ेगा -- १- जिस पुरुष के संग से आप में भगवान् के प्रति बढ़ने की रुचि उत्पन्न हो तथा २- जिसके संग से आप में गीता के १६वें अध्याय में कही हुई देवी सम्पदा के छब्बीस गुण आयें, वह आपके लिए संत है।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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