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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

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*साधक की इच्छा पर ही व्रजवास की अखण्डता निर्भर है*

            श्रीराधा-गोविंद के चरण-कमलों को ना भूलें, यही सावधान रहने की बात है। श्रीराधारानी ने अत्यन्त  दया करके जिन्हें ब्रजवास दे दिया है, उनके लिए यह निश्चित है कि जो खुशी से वृन्दावन छोड़कर नहीं जाना चाहता है, उसे अपने महल से कभी बाहर निकालती भी नहीं। वे उसे ही बाहर जाने देती हैं, जो स्वयं जाना चाहता है। अतः जब तक कोई जाना नहीं चाहता, तब तक श्रीराधारानी उसे नहीं निकालेंगी--यह परम सत्य है। हाँ, कहीं वह अन्य स्थान का आनन्द लेना चाहने लग जाए तो श्रीराधारानी ऐसी सरल स्वभाव की है, कि वह किसी की भी इच्छा में बाधा नहीं देती। जहाँ उन्होंने देखा कि यह अन्य स्थान देखना चाहता है, बस तुरन्त वे भी श्रीकृष्ण से कह देंगी--प्यारे! इसे  वहाँ पहुँचा दो। साधक की इच्छा पर ही ब्रजवास की अखण्डता निर्भर है। यदि साधक वहाँ से नहीं जाना चाहता, तो निश्चित है कि राधारानी उसे कभी नहीं निकालेंगी।

एक कवि ने गाया है --

काहे कौं रे नाना मत सुनै तूँ पुरानन के 
तैं ही कहा तेरी मूढ़, गूढ़ मति पंग की।
 बेद के बिबादन को पावेगौ न पार कहूँ,
छाँड़ि देहु आशा सब दान, न्हान गंग की।।
और सिधि सोधैे अब नागर न सिद्ध कछु,
 मान लेहु मेरी कही बार्ता सुढंग की।
जाहु ब्रज, भोरे! मन कौं रँगाई लै रे
 वृंदावन-रैन रची गौर-श्याम रंग की।।

             जिन्होंने व्रजवास अपना लिया है, उन्हें चाहिए कि व्रजवास का आनन्द लेते हुए, जीवन के शेष दिन बिता दें, तथा श्रीराधारानी की कृपा के भरोसे निश्चिंत रहें। मन में यह निश्चय कर लें कि अन्त समय श्रीभानुकिशोरी श्रीकृष्ण के साथ मुझे लेने अवश्य पधारेंगी। भला, कोई उनके निवास स्थान पर आकर इतने दिनों तक बसा रहे और वे एक बार भी दर्शन देने ना पधारें। यह भी कभी हो सकता है ? 'वे तो आयेंगी ही'--यह दृढ़ विश्वास करके उल्लास से व्रजवास का सुख लूटे। सर्वथा सत्य सिद्धान्त है यदि हम लोग श्रीभानुकिशोरी की कृपा के बल पर ऐसी आशा लगाये रहेंगे, तो कभी निराशा नहीं होगी। वास्तव में श्रीभानुकिशोरी कितनी कोमल हृदया  हैं, कैसी करुणामयी हैं, इसकी कल्पना भी अभी हम लोगों को नहीं हुयी। यदि कल्पना हो गई होती, तो हम लोग आनन्द से पागल जैसे हो गए होते। जो हो, खूब मौज से व्रज में बस रहना चाहिए। भले ही घर पर वज्रपात होता रहे। व्रज छोड़कर टस-से-मस ना हुआ जाय। बस निश्चिंत चित्त से श्रीराधारानी के धाम में निवास कीजिये। सदा याद रक्खें--भगवान और भगवान के धाम में किंचित् भी अन्तर नहीं है। श्रीधाम के संपर्क में आना सर्वथा श्रीकृष्ण के सम्पर्क में आना है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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