46

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

                *४६*

*उत्साह कभी मत तोड़िए और लेते जाइए श्रीकृष्ण का नाम*

           जीवन को सर्वथा प्रभु के चरणों में समर्पित करके निश्चिंत हो जाइये। सब चिन्ता छोड़कर प्रियतम श्रीकृष्ण की चिंता कीजिये। कुछ भी बदलना नहीं है, वह जहाँ जिस रूप में रखना चाहे वही उसी रूप में रहिये। केवल मन की गति बदल दीजिये, इस मन ने ना जाने कितनी जगह ममत्व कर रक्खा है। इस ममत्व रूपी बिखरे हुए कच्चे धागे को बटोर लीजिये और उनकी मोटी रस्सी बँट लीजिए तथा उसी मोटी रस्सी से अपने मन को प्रभु के चरणों में बाँध दीजिये। इतना ही कहना है, भगवान श्रीराम यही कहते हैं-- 

जननी जनक बंधु सुत। दारा तनु धनु भवन सुह्यदपरिवारा।।
सब कै ममता ताग बटोरी।
मम पद मनहि बाँध बरि डोरी।।
         
           *         *          *

अस सज्जन मम उर बस कैसें।
लोभी हृदय बसइ धनु जैसें।।
   
         --मन में बार-बार सोचिए, दृढ़ धारणा कीजिए---'प्रभु की हम पर बड़ी कृपा है।' यह बात केवल किसी से कहने से मान लें, यह नहीं; यह तो वस्तुस्थिति है। प्रभु ने अपनी कृपा का द्वार खोल रक्खा है। उन्हीं की कृपा का आश्रय करके, उनकी कृपा का अधिक-से-अधिक मात्रा में ग्रहण कीजिए और उन पर ही न्योछावर हो जाइये। 

               सच मानिए, श्रीकृष्ण से अधिक प्यार करने वाला, निरन्तर आप की सँभाल करने वाला, आपको कोई नहीं मिलेगा। परम श्रद्धेय भाईजी (श्रीहनुमान प्रसादजी पोद्दार ने सत्संग में एक बार एक कथा सुनाई थी---"एक योगभ्रष्ट महात्मा कहीं पैदा हुए थे। एक दिन में धूलि से खेल रहे थे। राजा की सवारी निकली, राजा ने पूछा--'धूलि से क्यों खेलते हो ?' महात्मा ने कहा--'धूलि से शरीर पैदा हुआ, धूलि में मिल जायगा, इसलिये धूलि से खेलते हैं।' राजा ने कहा--'मेरे साथ चलोगे ?' महात्मा ने कहा--'चल सकता हूँ, पर मेरी चार शर्ते हैं"। राजा ने शर्तें पूछी महात्मा ने कहा--'पहली शर्त है--'हम खूब सोयें, पर तुम कभी मत सोना और मेरी सँभाल करो। दूसरी शर्त है--तुम खुद मत खाओ और हमें खूब खिलाओ। तीसरी शर्त है--तुम कोई भी कपड़ा मत पहनो और मुझे पहनने के लिए खूब कपड़ा दो एवं चौथी शर्त है--तुम बराबर मुझे साथ रक्खो।' राजा ने कहा--'यह भी कहीं मानने की शर्ते हैं। आपके सोने पर सो सकता हूँ,जैसा खाता हूँ, वैसा खिला सकता हूँ, जैसे कपड़े पहनता हूँ, वैसे कपड़े पहनने को दे सकता और जब कहीं जाऊँ, तो साथ ले चल सकता हूँ। इतनी बातें हो सकती हैं।' तब महात्मा ने कहा--तुम्हारे-जैसे के पास जाकर क्या करूँगा। मेरा मालिक ऐसा है जो कभी स्वयं तो सोता नहीं, मैं खूब सोता हूँ और वह बराबर जागते रहकर मेरी सँभाल करता है। स्वयं कुछ भी खाता नहीं और मुझे खिलाता है। स्वयं कपड़े भी नहीं पहनता और मुझे बढ़िया-बढ़िया कपड़े पहनने को देता है और मेरे साथ ही निरन्तर रहता है। एक क्षण के लिए भी मुझे छोड़कर नहीं जाता।"

            ठीक ऐसे ही प्रियतम श्री कृष्ण को छोड़ कर संसार में लोगों के पीछे क्यों भटक रहे हो ? वह छोड़ दीजिये, यह नहीं कहता पर भोग भोगिये श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये। देह की सँभाल कीजिये--पर यह समझ कर भीतरी मन से यह ढृढरूप से मानकर कि देह उनकी सम्पत्ति है। उनके कृपा का आश्रय करके बढने की चेष्टा कीजियेगा तो कुछ भी असम्भव नहीं है। मन में दोष भरे हैं, माना ; पर यदि आप उत्साह तोडेंगे, तो यह और भी तंग करेंगे। उनके चरणों का आश्रय करके दोषों को निकाल डालिये। एक क्षण के लिए भी निराश मत होइये। हतोत्साह होना क्षीण हुए दोषों को बल देना है और जिस क्षण मनुष्य उत्साह भंग करता है उस समय दोष जोर मारने लगते हैं। इसलिए उत्साह कभी मत तोड़िए और लेते जाइए श्रीकृष्ण का नाम !

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157