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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*भगवान के नाम का आश्रय दृढ़ता से पकड़ लीजिए*
............भगवान के नाम का आश्रय दृढ़ता से पकड़ लीजिये। अन्य साधनों का विरोध नहीं है। सब करें, अच्छी तरह करें, पर आश्रय नाम का पकडें। जैसे छोटा बच्चा माँ का आँञ्चल पकड़े रहता है। इसके बाद--'हमें यह चाहिये, वह चाहिये'--सब चीजें खोजता है। बाप, भाई, बहन सब को चाहता है, परन्तु माँ का आँञ्चल नहीं छोड़ता। वह ऐसा इसलिए करता है कि उसे इस बात का भरोसा है कि माँ उसकी अहेतुक स्नेह से सदैव रक्षा करेगी। वैसे ही नाम का आश्रय पकड़ लें और फिर इसके बाद सब करें। ऐसा करने पर 'नाम' हमें तार देगा। सभी साधन अच्छे हैं, सदाचार अच्छा है, पर अन्तिम समय तक सदाचार सिद्ध नहीं हुआ तो ? सब चाहते हैं, मन वश में हो बहुत ठीक ; परंतु अन्त तक मन वश में नहीं हुआ तो ? देवी-सम्पदा के गुण होने आवश्यक हैं, बहुत ठीक ; पर यदि मरते समय तक वह नहीं आ सके तो ? ध्यान होना उत्तम बात है, पर यदि अन्त तक नहीं हुआ तो ? ऐसे ही सब साधनों की बात है। परन्तु यदि 'नाम' का आश्रय पकड़े रहेंगे तो यह 'नाम' हमें तार देगा और सब साधनों में भाव की जरूरत है। भाव होगा तो काम होगा। पर 'नाम' बिना भाव के ही हमारा काम कर देगा।
हम लोग कलयुगी प्राणी हैं। हमारी बच्चेकी-सी हालत है। दिन-रात मैले में लिपटे हुए हैं। यदि बच्चा अपना मैला धोता रहे,तो वह धोते-धोते मर जायेगा। उसका मैला तो माँ धोयेगी। इसी तरह 'नाम' हमारा निस्तार करेगा और सब साधनों में तो हमें उठना है, पर 'नाम' तो स्वयं अपनी शक्ति से उठाने वाला है। यह कितना अन्तर है! दूसरे साधनों में तो हमें शक्ति लगानी पड़ेगी, पर 'नाम' स्वयं अपनी शक्ति से काम कर देगा। मन से ना हो, भाव से ना हो--कोई बात नहीं; केवल जीभ से 'नाम' लें ; सकाम, निष्काम--कैसे भी करें, आदत डाल लें। जँभाई लेते, चलते-फिरते, छींकते आदि हर क्रिया में--जिस प्रकार हो, 'जीभ से' नाम लेते रहना चाहिए। माता देवहूति ने कहा है -
अहो बत श्वपचोअ्तो गरीयान् यज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम्।
तेपुस्तपस्ते जुहुवु: सस्नुरार्या ब्रह्मानूचुर्नाम गृहन्ति ये ते।। (श्रीमद्भा. ३/३३७)
यहाँ पर 'श्वपच' का अर्थ मामूली चण्डाल नहीं--'कुत्ते का माँस खाने वाला चण्डाल है।' उसकी जीभ पर नाम रहने की बात है, मन से लेने कि नहीं ; इस प्रकार जीभ से 'नाम' लेने वाला भी श्रेष्ठ माना गया है।
तुलसीदास जी महाराज कहते हैं --
भरोसो जाहि दूसरों सो करो।
मेरे तो माय बाप दोउ आखर...।।
शास्त्राध्यन और संत महात्माओं के सत्संग से यही निष्कर्ष समझ में आता है कि एक ही बात है और वह है--'नाम का आश्रय।' ऋषि--मुनि--सभी एकमत से निश्चय करके कह गए हैं कि इस कलयुग में कोई और सहारा नहीं है। बड़े-बड़े साधनों की बात भले ही कर ले। सचमुच जो 'नाम' का आश्रय छोड़कर दूसरे साधनों में लगते हैं वे प्राय: दोनों तरफ से जाते हैं। 'नाम' तो छोड़ दिया और दूसरा साधन सधा नहीं।
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नाम जप के नियम के सम्बन्ध में एकमात्र हमारे हृदय की उत्कण्ठा ही मुख्य वस्तु है। लगन रहने पर भगवान उसे अवश्य निभायेंगे। यदि जप की संख्या पूरी ना हो पाए, तो इसके लिए मन में सचमुच का दुख अनुभव होना चाहिए और भविष्य में प्रभु से प्रार्थना करते हुए कि 'अब फिर कभी भूल नहीं होगी।' ऐसा संकल्प करना यह सबसे उत्तम प्रायश्चित है।
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चिन्ता करना छोड़ दें, मन नहीं लगता, यह नहीं होता,वह नहीं होता--यों कहना 'नाम' पर अविश्वास करना है। 'नाम' होता है ना ? बस, सब ठीक है। दिन भर में एक बार ही तो 'नाम' निकल जाता ही है। फिर विश्वास करें लें, हमारा उद्धार यही 'नाम' कर देगा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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