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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*महात्मा का संग करने वाले के मन में ना कोई शंका होती है ना कोई प्रश्न उठता है*
लोग पूछ प्रश्न पूछते हैं--महापुरुषों के पास जाने पर प्रश्न याद नहीं आते और उनसे वियोग होते ही वे प्रश्न फिर उठ खड़े होते हैं, क्या करना चाहिये ? इसका उत्तर यही है कि महापुरुषों की यही महिमा है। प्रश्न, उधेड-बुन--सब-के-सब अन्धकार में ही होते हैं। महापुरुषों के सामने जाने पर अन्धकार मिट जाता है, फिर प्रकाश-ही-प्रकाश बच जाता है। निरन्तर सूर्य के पास रहने वालों को अन्धकार का दर्शन ही नहीं होता, उसी प्रकार निरन्तर महात्मा का संग करने वाले के मन में न कोई शंका नहीं होती, ना कोई प्रश्न उठता है। वहाँ केवल प्रेम की धारा ही नित्य निरन्तर बहती रहती है। श्रीनारायणस्वामीजी वृन्दावन के एक बड़े ऊँचे महात्मा हो गए हैं। लोग देखते हैं कि वह प्रतिदिन कुसुम-सरोवर से दौड़ते हुए एक-दो मील जाते, फिर वहाँ कुछ ही क्षण ठहर कर पीछे की ओर दौड़ते हुए कुसुम-सरोवर पहुँच जाते। प्रतिदिन उन्हें ऐसा करते देख लोगों ने पूछा---बाबा! ऐसा क्यों करते हैं ?' स्वामीजी ने बहुत आग्रह करने पर बताया--'क्या बताऊँ ? मैं देखता हूँ कि श्रीकृष्ण सामने खड़े हैं, मुझसे रहा नहीं जाता, मैं पकड़ने के लिए दौड़ पडता हूँ ; वे भागते हैं, मैं भी भागता हूँ। जब दौडते-दौडते थक जाता हूँ तो देखता हूँ--कि अब वे तो मेरे पीछे की ओर खड़े हैं। मैं भी पीछे मुड़ जाता हूँ। मैं पुन: पकड़ना चाहता हूँ। वे भागने लगते हैं, मैं भी पकड़ने के लिए दौड़ता हूँ। इस प्रकार दौड़ते-दौड़ते कुसुम-सरोवर वापस आ जाता हूँ।
लोगों ने पूछा--'बाबा! श्रीकृष्ण से कुछ पूछते हो कि नहीं ?"
स्वामी जी ने कहा--'भैया ,क्या बताऊँ ? पहले तो बहुत सी बातें याद रहती हैं, 'सोचता हूँ यह पूछूँगा' पर जिस समय वे सामने आते हैं, उस समय सब कुछ भूल जाता हूँ। केवल उनका अनुपम मुखड़ा ही देखता रहता हूँ।" यही बात होती है, महात्माओं के सम्बन्ध में भी ; जिसके सामने उनका जितना अधिक पर्दा उठा रहता है वह मनुष्य उतना ही अधिक उनके प्रेम को ग्रहण करता है। प्रेम ग्रहण होने पर शंका-प्रश्न नहीं होते। जो प्रश्न होते भी हैं, वह सर्वथा अलौकिक प्रेम के ही अंग होते हैं। प्रेममय होते हैं, प्रेम के प्रवाह को और भी प्रखर बनाने वाले होते हैं ।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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