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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*आपकी दृष्टि में संसार में जो सबसे ऊँचा पुरुष हो, उसके सरंक्षण में अपना जीवन बिताने की चेष्टा करें*
'भगवान् की दया को कैसे अनुभव करें--इस प्रकार की लालसा होनी बड़ी उत्तम है, पर यह सच्ची बात है कि इस लालसा को और भी पुष्ट करना पड़ेगा। एक चीज तो हम लोगों में बहुत कम पाई जाती है वह है--'श्रद्धा।' शास्त्रों एवं संतों की बात पर जब तक हम विश्वास नहीं करेंगे, उनकी कही हुई बातों का पालन नहीं होगा, तब तक भगवान की कृपा का अनुभव होना कठिन सा है। इसलिए आपकी दृष्टि में संसार में जो सबसे ऊँचा पुरुष हो, उसके सरंक्षण में अपने जीवन को बिताने की चेष्टा करें। ऊँचा पुरुष कौन है ?--इस बात के लिए भी आपको पहले शास्त्र पर श्रद्धा करनी पड़ेगी और जो ऊँचे पुरुष के लक्षण शास्त्र में आए हैं, उनके आधार पर ऐसे पुरुष की खोज करनी पड़ेगी। ऊँचे पुरुषों की जाँच करने में भी आपकी भूल हो सकती है, पर यदि आप शुद्ध नियत से भगवान का आश्रय पकड़ेंगे तो प्रभु सँभाल लेंगे। वे सबके पथ-प्रदर्शक हैं, सर्वज्ञ हैं ; वे सच्ची लालसा होने पर सब प्रकार का संयोग दया करके जुटा देते हैं। अत: आप सबसे पहले यही चेष्टा करें। गीता के १६वें अध्याय में स्वयं भगवान ने २६ दैवी गुणों का वर्णन किया है। वह गुण जिस व्यक्ति में अधिक-से-अधिक घटते हुये दिखाई दें, उसके हाथ में अपना जीवन दे दें। यह बात करने की है ; सचमुच जीवन की इसी में सार्थकता है। भोग भोगते हुआ ही यदि मनुष्य- जीवन भी समाप्त हुआ, तो फिर हमारे एवं कुत्ते में क्या अन्तर है ? पशु भी भोग करते हैं, हम भी भोग करते हैं। शास्त्र तो कहते ही हैं, अब वैज्ञानिकों ने यह भी सिद्ध किया है कि भोग भोगने में पशुओं को भी उतना आनन्द मिलता है, जितना मनुष्य को। इसलिये प्रत्येक मनुष्य को शीघ्र-से-शीघ्र अपना मनुष्य जीवन सफल बनाने की चेष्टा करनी चाहिये। यदि सोते-सोते ही समय बीत गया तो फिर पछताने के सिवा और कुछ भी हाथ नहीं लगेगा,-- ऐसा ऊँचे -ऊँचे संतों का अनुभव है। वे संत कभी झूठ नहीं बोलते, उनका कोई भी स्वार्थ नहीं था। वह ऐसा कहते हैं तो हमें मान लेना चाहिये कि वस्तुतः शीघ्र-से-शीघ्र मनुष्य-जीवन के असली लक्ष्य को प्राप्त करें। इसी में हमारी सफलता है। बस, गम्भीरता से विचार करें एवं जीवन को प्रभु के हाथ में समर्पण कर देने की शुद्ध लालसा लेकर आगे बढ़े।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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