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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

        *५*

*हर्ष को हम आनन्द में परिणत कर लें*

  अनुकूलता में हमें हर्ष होता ही है, पर यह हर्ष एक विकार है; आनन्द में सर्वथा भिन्न वस्तु है यह। हर्ष को आनन्द में परिणत कर लें, यही करना है। आनन्द तो प्रभु का स्वरूप है, प्रतिबिम्ब है, जो मन-बुद्धिरूपी दर्पण पर प्रतिबिम्बित होता है और तब तक स्थायी रूप से बना रहता है, जब तक मन-बुद्धि का भी आत्यन्तिक विलय प्रभु में नहीं हो जाता। किसी भी हर्ष को हम आनन्द का रुप दे दें अर्थात ऐसी भावना दृढ़ कर लें कि वह हर्ष हमें छोड़े ही नहीं। फिर यही विकार वरदान बन जायेगा और यही करना है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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