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*आस्तिकता की आधारशिलाएँ*

          *५०*

*भगवान से प्रार्थना करें--नाथ ! सन्तों के प्रति निःस्वार्थ प्रेम उत्पन्न कर दो*

         हाथ जोड़कर दीन हो कर रोते हुए हम लोग भगवान से प्रार्थना करें--'प्रभु! अत्यन्त पामर, दीनहीन, मलिन, इस विषयों के कीट, हम लोगों पर अपनी कृपा प्रकाशित करो। नाथ ! तुम्हारे जन--संतों के प्रति नि:स्वार्थ प्रेम, केवल प्रेम के लिए प्रेम उत्पन्न करवा दो। प्रतिदिन प्रार्थना करें। प्रार्थना से बड़ा काम होता है, ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे भगवान ना दे सके। ऐसी कोई प्रार्थना नहीं है, जिसे भगवान पूरी ना कर सके। वे असम्भव को सम्भव, एक क्षण में सबके लिए बिना पक्षपात के कर सकते हैं, पर हम लोगों का उन पर विश्वास नहीं, यही दुर्भाग्य है --

हरि से लगा रहु रे भाई
तेरी बनत-बनत बनि जाई
 
   भक्त भारतेन्दु बाबू का एक पद है, जिसकी दो पक्तियाँ ये हैं-- 

जो हम बुरे होई नहिं चूकत नितहि करत बुराई
तो तुम भले ही शान्त होई छाँड़त हौ काहें नाथ ! भलाई ?
 
        'नाथ ! मैं बुरा हूँ। बुरा करना मेरा स्वभाव है। मैं नित्य-निरन्तर बुरा ही करता रहता हूँ। बुराई करने से कभी भी नहीं चूकता, अपना स्वभाव मैं नहीं छोड़ता ?  तब मेरे नाथ तुम बड़े होकर अपना स्वभाव क्यों छोड़ते हो ? तब मेरे नाथ ! तुम भले होकर अपना स्वभाव क्यों छोडते हो ?  तुम्हारा स्वभाव तो भला करना ही है, और फिर तुम भी अपना स्वभाव मत छोड़ो।'

             बिल्कुल ऐसी ही बात भगवान करते हैं। जैसे सूर्य में यह शक्ति नहीं है कि वह किसी को अन्धकार दे सके। वैसे ही भगवान में--विनोद की भाषा में कहने पर यह कहा जा सकता है कि उनमें यह शक्ति नहीं है कि वे किसी की बुराई कर सके। अब हम सोचें-जीत किसकी होगी ? एक ओर अखिल ब्रह्माण्डपति अपने स्वभाव का पालन करेंगे और एक और एक ओर तुच्छ प्राणी अपने स्वभाव का पालन करेगा। इन दोनों में निश्चय ही जीत भगवान् की होगी ।

*।। परमपूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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