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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

         *५१*

*महापतित भी भगवान का प्यार पा सकता है*

        यदि आप अशान्ति का अनुभव करते हैं तो भगवान की शरण में जाइये। चाहे कोई नीच,  सर्व अधम, सबकी नजर से गिरा हुआ--कैसा भी क्यों ना हो, यदि वह सच्चे मन से भगवान की शरण में चला जाए तो वे उसे तत्क्षण हृदय से लगा लेते हैं। जो निरन्तर भजन करने वाला है, उसे वह बहुत प्यार करते हैं--यह ठीक है ; किंतु महापतित भी उनका प्यार पा सकता है। केवल नीयत होनी चाहिए, प्यार पाने की। एक बार के लिए सच्चे मन से उनके सम्मुख होना चाहिए। आप भी हृदय खोल कर उनके सामने कहिए--'दयामय ! मुझ-जैसे प्राणी को केवल आपकी अहैतुकी कृपा से ही अपनाना होगा।' यदि सचमुच इस प्रकार की प्रार्थना अवश्य करेंगे, तो फिर सब व्यवस्था अपने आप बैठ जाएगी। प्रार्थना हृदय से नहीं होती, इसलिए प्रभु भी सुनकर भी नहीं सुनते किंतु जब तक हृदय से ना हो तब तक केवल वाणी मात्र से भी करें, करें अवश्य। वाणी मात्र की प्रार्थना भी बहुत लाभदायक है।

 *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू।।*

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