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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *५२*

*सब चिन्ता छोड़ कर मन को प्रभुमय बना लीजिये*

         जो श्वास बीत गए ,वह लौटेंगे नहीं। उनका सदुपयोग अथवा दुरुपयोग--जो होना था, वह तो हो गया। अब जितने बचे हैं, उनको बड़ी सावधानी से भगवान के भजन स्मरण में बितायें। सारा विवेक बटोर कर बार-बार यह निश्चय कीजिए कि यहाँ की कोई भी चीज साथ नहीं जाएगी। धन, परिवार, पुत्र, मान, प्रतिष्ठा सब यही रह जायँगे और मन अच्छे-बुरे संस्कारों को लेकर आपके साथ चलेगा। ऐसी दशा में जो सबसे अच्छी चीज हो, उसे ही उस मन में भरिये। सबसे अच्छी वस्तु है--भगवान ! उन से उत्तम कुछ भी नहीं है। उन्हीं को भरिये। सब चिन्ता छोड़ कर प्रभुमय बना दीजिये, बनाने की चेष्टा कीजिये। स्वयं अनन्त आनन्द में डूब जायँगे और जगत को भी पावन कर दीजियेगा ।

            इत्र बेचने वाले को ले लीजिये। वह जहाँ अपना इत्र बेचने बैठ जाता है, वहाँ का वातावरण इत्र की सुगन्ध से भर जाता है। ऐसा क्यों होता है ? क्योंकि उसके डिब्बे में इत्र भरा हुआ है, किसी के ना चाहने पर भी सुगन्ध मिलती है। इत्र बेचने वाला यदि ना भी चाहे तो भी सुगन्ध लोगों को मिलती ही है। इसी प्रकार यदि आप अन्तःकरण में भगवान को भर सके तो फिर स्वयं आनन्द में मग्न होकर, सारे जगत में जो भी,आप के सम्पर्क में आयँगे, उन्हें भी दिव्य आनन्द दान करेंगे, तरण-तारण बन जायँगे।

         मृत्यु का ठिकाना नहीं। उसके पहले-पहले ही अपनी जान में पूरी शक्ति लगानी चाहिये। फिर कृपामय प्रभु कमी पूरी करेंगे। अनन्त कृपा बरस रही है। उसे ग्रहण कीजिये। कृपा को आने के लिए अन्तःकरण में प्रवेश के लिए आप मार्ग दे दें, बस।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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