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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

           *५३*

*प्रतिकूल परिस्थिति में भी भगवान की दया देखिये*

         जो हुआ, हो रहा है, होगा, वह सर्वथा मंगलमय के विधान के अनुसार होगा ; सभी बातों में सर्वथा केवल मंगल ही मंगल भरा है। यह ठीक है कि हम लोगों की दृष्टि सीमित रहती है, अनुकूल परिस्थिति में भगवान का हाथ दिखता है। पर सच मानिए,भगवान की जितनी दया अनुकूल स्थिति में है, ठीक उतनी ही दया प्रतिकूल स्थिति में भी है। जिस दिन मनुष्य अपने आप को उनके चरणों में समर्पित कर देता है, उस दिन यह बात समझ में आती है, इसका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। उसके पहले शास्त्र के वचनों पर, संतों के अनुभव की अनुभूतियुक्त वचनों पर विश्वास करके ऐसी भावना करनी पड़ती है। जितनी मात्रा में भावना दृढ़ होती जाती है, उतनी ही मात्रा में दुख भी कम हो जाता है। अवश्य ही भजन इस बात में अत्यधिक ,सबसे अधिक सहायक होता हैं आप किसी संत से मिलना चाहते हैं, पर मिल नहीं पाते--इस बात के अन्तराल में भी बड़ा मंगल छिपा है। यह जाने और यह ठीक समझें कि जिस दिन भगवान् उन संत को आपसे मिलाना चाहते उचित समझेंगे,  उस दिन अपने-आप बिना किसी चेष्टा के वे मिल जायँगे, अपने-आप संयोग बन जायँगे ।

               देखें, अग्नि में यह गुण होता है कि यदि गंदी-से-गंदी चीज भी उस में डाल दे तो उसका गंदापन नष्ट करके उसे अपना स्वरूप देती है।  आग की यह शक्ति जहाँ से आती है, जो समस्त शक्तियों का केंद्र है, वह वस्तु है--भगवान ! बड़ी आसानी से कृपामय सब मल नष्ट करके अपने प्यारे भक्तों को अपने समान कर लेते हैं। उसमें तनिक भी भेदभाव नहीं है। उनके लिए सब समान हैं। उनके सम्मुख जाने भर की देर है। इसीलिए उनकी ओर मुँह करें, मुँह करने की चेष्टा करें, चाह करें। इसमें भी वे सहायता करेंगे।

 *परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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