54

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

         *५४*

*किसी भी असत् कमाई को स्वीकार ना कीजिए*

             भजन के साथ-साथ यदि कई खास बातों पर ध्यान दिया जाय तो बहुत शीघ्र भजन का प्रत्यक्ष फल सामने आने लगता है। उन्हीं में से एक बात है--सात्विक पवित्र अन्न का भोजन, अर्थात यह की अन्न सात्विक हो तथा सात्विक विधि से तैयार किया जाय।  पर सबसे अधिक किस बात का विचार आवश्यक है कि अन्न सात्विक कमाई का है कि नहीं। यह बात साधारण जान पड़ती है ; मन को दूषित करने के लिए यह कितनी जिम्मेवार है--इसका महाभारत की एक कथा से पता चलता है। भीष्मपितामह के विषय में स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने कहा था--'युधिष्ठिर ! ज्ञान के सूर्य (भीष्मपितामह) अस्त होने जा रहे है ; उनसे जो सीखना हो, सीख लो।' ऐसे भीष्मपितामह की बुद्धि दूषित खाने से बिगड़ गई थी। कथा आती है कि ज्ञान के सूर्य भीष्मपितामह  शरशय्या पर जब उपदेश कर रहे थे, तब द्रौपदी हँस पड़ी। भीष्म ने पूछा, बेटी तू हँसी क्यों ? तू पविव्रता है, तुम्हरी-जैसी स्त्री अकारण नहीं हँस सकती। द्रौपदी ने कहा- 'पितामह मैं यह सोच कर  हँसी कि आपका यह ज्ञान उस समय क्या हो गया था, जब मेरी साड़ी भरी सभा में खींची जा रही थी ?' भीष्म ने कहा--'तू ठीक कहती है बेटी, बात यह है कि उस समय मैं पापात्मा दुर्योधन का अन्न खाता था, इसलिए मेरी बुद्धि कुण्ठित हो गयी थी और मैं न्याय-अन्याय का विचार नहीं कर सका।' जब भीष्म सरीखे महात्मा की बुद्धि बिगड़ सकती है, तब फिर हम लोग तो कलयुगी महान पामर प्राणी स्वभाव से ही है। इसलिए आप यदि इस विषय में सावधान रहें, तो बड़ी शान्ति मिलेगी। मरना है,शरीर से वियोग होगा ही ; और बस, उसी क्षण आपका अपने पुत्,र परिवार, स्त्री, परिजन--सब से नाता टूट जायगा। साथ चलेंगे, कर्मों के संस्कार और कर्मों के करते समय जो पाप-पुण्य का बोझा इकट्ठा हुआ वह। फिर बुद्धिमानी इसी में है कि असत् कमाई को स्वीकार ना करें। परिवार के बहाने से मन धोखा देता है। इसी धोखे से अब तक संसार में भटक रहे हैं। खूब सावधान होना चाहिए। यह ठीक है कि आप ब्राह्मण कुल में पैदा हुए हैं तो अयाचित दान स्वीकार कर सकते हैं, पर मन बड़ा धोखेबाज है। इससे पग-पग पर सावधान रहना चाहिए। एक पैसा भी स्वीकार करने से पहले अवश्य विचार कर लें। सत्य का आश्रय लेने से यदि आपको प्रत्यक्ष में बहुत आर्थिक हानि हो और उससे भरण-पोषण में बड़ी कठिन समस्या उत्पन्न हो जाय, तो उसे सहर्ष स्वीकार कर लेना चाहिये। भरण-पोषण के लिए आपका ग्राम में जाकर मुट्ठी-मुट्ठी चावल माँग कर भिक्षावृत्ति से जीवन निर्वाह करना ना मिलने पर भी भूखा मर जाना अच्छा है। उदर-भरण के लिए अथवा परिवार की रक्षा के लिए किसी भी असत् कमाई को स्वीकार करना अच्छा नहीं। यह बात आजकल बहुत कठिन-सी प्रतीत होती है, वातावरण का असर सबके ऊपर कम-वेशी मात्रा में पड़ चुका है। इसलिए सत्य के लिए मरना बहुत कठिन बात जान पड़ती है, पर है यही असली मार्ग। इसी में शान्ति है, इसी में सुख है, इसके विपरीत चाहे कोई हो यदि वह असत् मार्ग का अवलम्बन करता है तो उसका वर्तमान जीवन भी दुख से अधिक बीतेगा और परलोक तो अन्धकारमय है ही। इसलिये प्रार्थना है, खूब सावधान रहें प्रभु के मार्ग की ओर बढ़ने में सत्य पूर्ण, सदाचारपूर्ण जीवन बड़ा सहायक होता है।

 *।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157