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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*मन को उधेड़बुन से खाली करके उसमें प्रभु की मुख शोभा को भरिये*
विचार कीजिये--आपका घर और घरवाले आपके नहीं हैं। आप इसे अतिथिशाला, धर्मशाला मानें तथा इसमें रहने वालों को विभिन्न मार्गों पर जाने वाले बटोही समझे। खूब प्रेम करें, पर वह प्रेम ठीक-ठीक वैसा ही होना चाहिये, जिससे असली घर की विस्मृति ना हो जाये। थोड़ी देर के लिए गम्भीरता से विचारें--मृत्यु होने के बाद आपका घर से क्या सम्बन्ध रहेगा ? जब एक दिन यह सम्बन्ध में निश्चित छूट जायगा तब वैसे घर में यदि कम दिन के लिए रहने को मिला तो दुख किस बात का। दुख तो इस बात के लिये भले ही होना उचित है कि 'ओह ! कितना काल बीत गया, स्वामी के घर--असली घर में एक बार भी पैर नहीं रखा।
आपकी यह अभिलाषा बड़ी सुन्दर है--'क्या किसी दिन यह जीवन भी होगा, जब श्री गोपियों की तरह सारा विश्व प्रभु में देख सकेगा ? सचमुच कामना और शक्ति से रहित मेरा हृदय किसी दिन एकमात्र प्रभु के लिए व्याकुल हो उठेगा ?' ऐसी अभिलाषा भगवान की अपार कृपा से होती है। अतः जो प्रभु आपके हृदय में बैठकर इन भावों की सूचना कर रहे हैं, वह अवश्य तथा निश्चित ही आगे जाने का मार्ग भी प्रकाशित करेंगे। आप उनकी करुणा पर विश्वास कीजिये। हृदय की सारी शक्ति बटोर कर मन में यह निश्चित दृढ़ता से जमा लीजिये कि आपके ऊपर एकमात्र उनका अधिकार है और फिर बस एक ही बात के लिए निरन्तर पुकारते रहिये। 'मेरे नाथ ! वही करो जो तुम्हारी इच्छा हो ; बस यही करो, तुम यन्त्री हो, मैं यन्त्र हूँ, तुम नचाने वाले हो, मैं कठपुतली हूँ।'
'क्या हुआ, क्या नहीं हुआ, क्या होता है, क्या नहीं होता है ; क्या होगा, क्या नहीं होगा'--इस उधेड-बुन से मन को खाली करने की भरपूर चेष्टा कीजिये। इसके बदले मन में भरिये उनकी मुखशोभा, भरते चले जाइये, केवल इतना ही करना है, सच मानिये, मन जितना उस माधुरी से सनेगा, उतनी ही शीघ्रता से राह कट जाएगी।
अनादि काल से पाप के संस्कारों ने, आसक्ति ने मन को मैला कर रखा है, इसलिए वह उस सौन्दर्य में न रमकर जागतिक सौंदर्य में रमता है। *"श्रद्धेय भाईजी ने एक बार अपने अनुभव की बात बताई थी--'नाम लेते जाओ', जितना अधिक लोगे,उतनी शीघ्रता से मल धुलेगा।"* यह बात बिल्कुल ठीक जँचती है, अनुभव में भी आती है। इसलिए खूब नाम लें और साथ-साथ मन को उन में डुबोए चले जायँ। फिर सब अपने-आप हो जायगा।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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