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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*मनको जगत की बातोंसे खाली करके प्रियतम प्राणनाथकी छविके स्मरणसे भरें*
पारिवारिक उलझनों को लेकर आपको उद्वेग होता है, यह स्वाभाविक है ; पर जब तक इस से छूटने को जो वास्तविक उपाय है, उसे नहीं करेंगे, तब तक व्याकुलता मिटनी, उद्वेग मिटना बड़ा ही कठिन है। परमार्थ के पथिक के लिए यह सर्वथा उड़ा देने की चीज है ; पर आप का मन कमजोर है ; मन में आसक्ति है और सबसे बड़ी बात यह है कि आपका मन जैसा प्रभु के चरणों में लगना चाहिए, वैसा नहीं लग रहा है। इसलिए यह उलझने विकट रूप में दिख रही हैं। सच मानियेबहुत अधिक आवश्यकता इस बात की है कि आप इन परिस्थितियों को बिल्कुल महत्व ना देकर एकान्त एवं शान्त चित्त से अपना मन प्रभु के चरणों में लगाने की चेष्टा करें। यदि आप चाहेंगे की परिस्थिति पलटे तो ऐसा होना बड़ा ही कठिन है। इसका कारण यह है कि जगत के प्रत्येक प्राणी की प्रत्येक चेष्टा के क्षुद्र-से-क्षुद्र अशुद्ध अंश का नियन्त्रण भगवान की शक्ति से होता है और उसमें कितना मंगल किसका होता है, इसे केवल भगवान ही जानते हैं। पर मंगल ही मंगल होता है, यह प्रत्येक उच्च संत का प्रत्यक्ष अनुभव है। अतः आप की दृष्टि में आपके मन से सर्वथा प्रतिकूल चेष्टा करने वाले की प्रत्येक उनकी शक्ति से नियन्त्रित है। वे चाहें तभी भी पलट सकती हैं, अन्यथा नहीं पलटेंगी--इस बात पर विश्वास होना बड़ा ही कठिन है। नहीं तो यह विश्वास होते ही सारा दुख तत्क्षण मिट जाये।
आप इस फेर में मत पड़िए कि 'मेरा व्यवहार कैसे सुधरे ? मैं अपने परिवार के व्यक्तियों कैसा आचरण करूँ कि उनका और मेरा परम कल्याण हो ?' आप उनकी चिन्ता छोड़ दीजिये और यह चिन्ता भी छोड़ दीजिये कि 'मेरा व्यवहार सुधर जाय ;ऐसा हो जाये कि वे लोग मुझसे प्रसन्न हो जायँ।' ऐसा विचार करना लाभदायक होता है, पर सबके जीवन में सब अंश में एक प्रकार की साधना का क्रम नहीं हो सकता।
संसार के प्रति उपरामता को देखते हुए बार-बार मन की बिखरी हुई वृत्तियों को इस कोलाहल से हटाकर नित्य सुख में प्रभु के चरणों में जोड़ते रहना-- आप इसे ही करें। यदि आप मन को जगत एवं घर की बातों से खाली करके प्रियतम प्राणनाथ की छवि कैसे भरेंगे तो वह बात होगी कि उसकी कल्पना भी नहीं हो सकती। भगवान की पूर्ण कृपा आप पर है। इतना ही नहीं यह जटिल समस्याएँ भी आपको कीचड़ से निकालने की ही उपक्रम है।
हृदय का एक बड़ा अंश अभी सांसारिक शक्तियों से घिरा हुआ है। शायद आपको पता भी नहीं चलता होगा कि वह सांसारिक आसक्ति कैसी है कहाँ है, किस रूप में है ; पर वह है। इन सारी आसक्तियों को छोड़ने के लिए तैयार होना पड़ेगा, छूटेगी तो प्रभु के छुड़ाये, पर चाह तो आपको करनी पड़ेगी। सारांश यह है कि जिस-किसी भी प्रकार से मन को इन उलझनों को सुलझाने में ना लगा कर उनको भूलने की चेष्टा करें। थोड़ा कठिन है, पर प्रभु सहायक है ; यह हो सकता है। "आप गृहस्थ हैं और जब तक प्रभु चाहेंगे, तब तक उसमें रहना ही पड़ेगा। जीवन निर्वाह के लिए चेष्टा भी करनी ही पड़ेगी। उसे कीजिए, कमाते हैं तो न्याय की कमाई हो और उससे जो प्राप्त हो उससे आपके परिवार की जो सँभाल कर रहे हों, उन्हें सौंप दीजिये। घर में सब से सम्मान, प्रेम, हित और सत्य, इन चारों बातों को ध्यान में रखकर व्यवहार कीजिए। बड़ी शांति से रहिये किसी दूसरे की अशान्ति से आप भी अशान्ति मोल लेते हैं तो भूल करते हैं। ध्यान रखिये--कुछ भी अनहोनी नहीं होती। एक भी पत्ता प्रभु के विधान से ही हिलेगा। सुख-दुख, निंदा-स्तुति, इज्जत-बेइज्जती---सब ठीक नियम से आयेंगे। उनके विधान से आयेंगे। इस पर विश्वास करें, ना करने से दुख बढेगा। कभी कुछ, कभी कुछ सोचते-सोचते माथा गंदे भावों से भरेगा। ऐसा ना होकर वह भरे एकमात्र प्रभु के स्मरण से, यह चेष्टा कीजिये।"
*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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