57

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

                *५७*

*भजन के लिए भजन, चिन्तन के लिए चिन्तन करने की चेष्टा कीजिये*

   'जब नित्य-कर्म करने बैठता हूँ,तो तमोगुण बहुत आ जाता है,ऊँघने लगता हूँ ; इससे विक्षेप बहुत होता है।' इस प्रश्न के उत्तर में विचार करने पर तीन बातें ध्यान में आती हैं--(१)  जिसकी पाचन शक्ति खराब होती है उसे आलस्य विशेष आता है २) आवश्यकता-भर नींद रात में ना ली जाये तो दिन में आलस्य आता है। (३) भगवान के चरणों में प्रेम ना होने के कारण उनके चिन्तन में आनन्द नहीं आता इसलिए वृत्तियाँ आलस्य से अभिभूत होती हैं। ये ही तीन कारण प्रायः हेतु होते हैं। आप यथा सम्भव पहले दो कारणों पर विचार करके उनमें से कोई-सा होने पर उन्हें सात्विक उपचार एवं आवश्यकता-भर नींद लेकर दूर करने की चेष्टा करें। पर यह दोनों ही गौण हैं--मुख्य बात तीसरी है। जिस क्षण प्रियतम प्रभु के चिन्तन में रस आने लगेगा, उस क्षण आलस्य सर्वथा नहीं आ सकता। प्रेमी महात्मा तो ऐसे-ऐसे हो गए हैं, जो वे कभी सोते ही ना थे। उन्हें जागने की चेष्टा करनी पड़ती हो, ऐसी बात नहीं। स्वभाविक निरन्तर प्रेम में डूबे रहने के कारण वे माया से सर्वथा पार हो जाते हैं। पर हम लोग तो अभी जो स्थिति में है, उसी को लेकर विचार करना है। अत: किसी प्रकार भजन एवं चिन्तन में रस आने लगे तो फिर यह दोष दूर हो जाय। किंतु इससे भी एक ऊँची बात यह है कि रस आने का भी भाव छोड़कर केवल भजन के लिए भजन एवं चिन्तन के लिए चिन्तन करने की चेष्टा की जाय। रस आना तो  भजन एवं चिंतन का आनुसंगिक फल है, वह तो आकर ही रहेगा। (जब तक नहीं आता तभी तक यह दोष है) इसलिए अपनी जान में आलस्य के वश में ना होने के बार-बार दृढ़ निश्चय कर के भजन एवं स्मरण को बढ़ाने की चेष्टा करें। उनकी कृपा पर विश्वास करें। बस, आपका इतना ही काम है। वह चाहे तो अभी इसी क्षण आप की दशा महाप्रभु चैतन्य-देव की सी कर दें, जो निरनतर १२ साल तक रोते रहे। गौड़ीय महात्माओं का विश्वास है कि महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्ण ही थे। अतः अपने मन में ऐसी शंका हो सकती है की 'वैसी अवस्था मेरी कैसे होगी' तो उन्हें छोड़ दें। आज तक जितने प्रेमी भक्त हो गए हैं, उनकी ही बात सोचिये। आप विश्वास कीजिए-- (१) श्रीकृष्ण को जो सम्बन्ध उन प्रेमी महात्माओं से था ठीक वही-का-वही सम्बन्ध आपके साथ है। (२)उनमें विषमता नहीं है, वे आपको भी ठीक उतना ही प्यार करते हैं। (३) आपकी सब जानते हैं। (४) उनसे बढ़कर आपका कोई हित करने वाला ना कोई है, ना था, ना होगा। (५) वे सर्वसमर्थ हैं, जिस क्षण जो चाहें,  कर सकते हैं ।

    यदि इन पाँच बातों पर दृढ़ विश्वास जमा सके तो समझना चाहिये कि आप तो पूर्ण समर्पण के  मार्ग पर आरूढ़ हो गये। इसलिए सब चिन्ता छोड़कर इन पाँच बातों पर विश्वास कीजिये-- अटूट विश्वास कीजिये और जीभ से उनका अधिक-से-अधिक नाम लीजिये। मन को भी यथा सम्भव उनमें लगाने की चेष्टा कीजिये ; पर ना लगे तो घबराइए मत, निराश मत होइये। फिर दोष नहीं रहेगा, सर्वथा निर्दोष बनकर वे स्वयं आपको कलेजे से लगा लेंगे। देरी नहीं होगी ; इतनी जल्दी होगी, जितनी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। पर यह सब विश्वास करने से होगा। इस विश्वास को प्राप्त करने के लिए जो भी करना पड़े, वह करने के लिए सच्चे मन से तैयार हो जाइये ; फिर यह विश्वास भी बहुत सस्ते मिलेगा। अवश्य ही, इस सौदे के लिए आपको तैयार होना चाहिये।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157