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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

               *५८*

*प्रभु हमें लेकर खेल रहे हैं*

   वस्तुतः हम लोग अपने आपको ही भूले हुए हैं। हम लोग शरीर हैं क्या ? विचार करनेपर पता लगेगा--नहीं, शरीर तो नहीं हैं। शरीर तो अब तक अनन्त प्राप्त कर चुके हैं। अमुक-अमुक नामसे परिचित ये शरीर भी यहीं रह जायँगे, हम लोग इन्हें छोड़ देंगे, निश्चय छोड़ देंगे। तब हम लोग कौन हैं ? गीता में देखें--भगवान् कहते हैं--

*ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातन* (१५/७)

             हम लोग उन्हीं के वंश के हैं, बिल्कुल उसी धातुके हैं, जिस धातुके भगवान् हैं, पर हम लोग उनको भूल गये। इसलिये अपने को भी भूल गये और सोचने लगे--'ये शरीर-ही-हम लोग हैं।' अब यदि उन्हें याद करें, उन्हें बीच में ला रखें, तो पहले अपनी-अपनी स्मृति होगी, फिर यह स्मृति जाग उठते ही हम लोगों का सम्बन्ध इतना निकटतम हो जायगा कि उस निकटता का वर्णन भी नहीं हो सकता। सच मानिये--हम लोग जितनी
देर तक प्रभु को बीच में रखते हैं,उतनी देर के लिये वे बिल्कुल निकट से भी निकट हैं। उनको भूलने पर वे इतनी दूर चले जाते हैं कि उसकी कल्पना भी नहीं हो सकती, वर्णन होना तो दूरकी बात है। प्रभु को बीच में रखकर हम दो प्रकार के अनुभव करेंगे-- (१) जो सम्बन्ध उनका एक से है, वही सम्बन्ध उनका दूसरे से भी है तथा (२) दोनों समान हैं, दोनों उनके हैं। दो हैं ही नहीं, एक के ही दो बना लिये गये, तीन बना लिये गये हैं, हजार बना लिये गये हैं। किसने बनाये है ? हमारे स्वामी ने। तो यह खेल है ? हाँ, खेल है,  हमारे स्वामी का खेल है, हमें लेकर वे खेल रहे हैं। खूब खेलो, नाथ ! बलिहारी तुम्हारे खेल की !!

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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