59

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
 
            *५९*

*उनके लिये उनको भजिये*
 
   एक मुसल्मान-परिवारमें एक भक्तिमती नारी हुई है, जिसका नाम था 'रबिया'। रबिया ने कहा है-- 'मेरे प्राणनाथ ! यदि स्वर्ग की कामना से मैं तुम्हें भजती हूँ तो मेरे लिये स्वर्ग का द्वार बंद कर दो। और यदि नरक के डर से तुम्हें भजती हूँ तो मुझे नरक की ज्वाला में भस्म कर दो ; पर यदि मैं तुम्हारे लिए भजती हूँ तो मुझे मिल जाओ।' कैसा सुन्दर भाव है ! सचमुच जिस दिन उनके लिये मनुष्य उनको भजने लगता है, फिर उस भजनमें एक अपूर्व स्वाद होता है--विलक्षण मिठास होती है--भजन प्राणों से बढ़कर प्यारा लगता है। पर ऐसा सहसा किसी-किसी महात्मा के जीवन में ही होता है। क्रमश: विकास ही साधारणतया देखा जाता है। अतएव सर्वथा अनुद्विग्र चित्त से,उनके लिये उन्हें भजने का अभ्यास बढ़ाते रहें। अर्थात् सर्वथा सभी प्रकार की कामना से रहित होकर उनके चरणों मे न्यौछावर होने का उद्देश्य रखकर उन्हें भजिये। लौकिक परिस्थितियाँ अनुकूल-प्रतिकूल जैसी भी आयें, उन्हें उनका विधान समझकर अतिसय प्रेमपूर्वक स्वीकार कीजिये। यह करना पडेगा। उनकी कृपा का आश्रय लेकर अपने जीवन में साधना को उतारना पड़ेगा। उतरेंगे वे ही, उनकी दया ही सब करेगी। पर उसके लिए अपना हृदय खोलकर उनके सामने करना हम लोगों का काम है। वे आपके हैं और आप उनके हैं, वे आपके हृदयधन हैं और आप उनके हृदयधन हैं। इस मधुर सम्बन्ध को हृदय में बार-बार जाग्रत कीजिये और मलिन-से-मलिन हृदय ही उनके सामने कीजिये। वे अपने लायक उसे बना लेंगे, अवश्य बना लेंगे। उनकी कृपा का पार नहीं है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157