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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*वस्तु के परिवर्द्धन की भावना को भूलकर हम भगवान् की रट लगाना शुरु कर दें*
किसी अनुकूल वस्तु की सत्ता का अनुभव होकर उसमें परिवर्धन होने की इच्छा का नाम 'लोभ' है। यह भी एक बड़ा दोष है। हम विचार करें--क्या वह वस्तु सचमुच बिन कहे भगवान की कृपा से बढ़ नहीं जाती, यदि वह हमारे लिए आवश्यक होती ? क्या भगवान को यह ज्ञान नहीं है कि इतने में इसका काम नहीं चलेगा, इसे बढ़ा देना चाहिए। बच्चा जब बहुत छोटा होता है, तब उसे कितना दूध पिलाना चाहिए, कितने कपड़े चाहिए, इसका ध्यान बच्चा रखता है या उसकी माँ रखती है ? बच्चा तो भूख लगने पर रोता ही है। रोने के अतिरिक्त उसके पास और कोई साधन नहीं है। तो वस्तुतः हैं तो हम भगवान की दृष्टि में बच्चे के समान ही; किंतु भ्रमवश समझ रहे हैं अपने को चतुर और निर्णय करने लग जाते हैं कि *'इस चीज की तो त्रुटि है, यह तो पूरी होनी ही चाहिए।'* यह सब विचार उपासना में बाधक हैं । यदि हमारी परिवर्धन की इच्छा हो, किसी वस्तु के परिवर्धन की भावना हमारे मन मे उदय हो तो हम भगवान को पुकारने लग जाएँ और सचमुच भगवान पर ही इसका भार छोड़ दें। हम परिवर्धन की भावना को भूलकर भगवान की रट लगानी शुरू कर दें। हम देखेंगे कि दो बातों में से एक बात होकर रहेगी--
(क) या तो हमें विस्मृति हो जाएगी उस परिवर्धन की
अथवा
(ख) रोने पर माँ जैसे दूध पिला देती है, वैसे ही हमारी परिवर्धन की चाह पूरी हो जाएगी और साथ ही एक विश्वास का भाव इतना तीव्र हो उठेगा की क्रमशः आगे परिवर्धन की चाह में काफी शिथिलता आ जाएगी और हम ऊपर उठ जायँगे।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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