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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *६१*

*प्रति तीन घंटे पर इन बातों पर विचार करें*
 
           मन के अनेक रूप है--जैसे काम, संकल्प, संशय आदि। इनके स्वरूप को समझकर इनके विषय में किस प्रकार सावधानी बरतनी चाहिये, इसके लिये इस विवेचन पर ध्यान देना आवश्यक है। 
(१) काम-- किसी चीज की इच्छा करने का नाम है--काम। आप किसी चीज की इच्छा मत कीजिये। आप अपने मन से ऐसा मत सोचिये कि 'अमुक चीज इस रूपमें हो।'
(२) संकल्प-- किसी अच्छे काम के लिये संकल्प, जो भगवान् की ओर ले जाने वाला हो। दूसरा कोई संकल्प मत कीजिये।
(३) संशय-- दुनिया के बारे में संशय कर सकते हैं पर भगवान की सत्ता या परलोक या पुण्य-पाप के विषय में संदेह मन में हो तो उसे निकाल दें।
(४) विश्वास-- वास्तव में विश्वास करने लायक एकमात्र भगवान हैं। यह सुझाव दिन भर में कम-से-कम १५-२० बार अवश्य अपने मन को दीजिये कि भगवान् आपको कभी धोखा नहीं देंगे और कोई भी धोखा दे सकता है। सब कुछ भगवान में है, सब कुछ भगवान से बनता है--निकलता है। भगवान् सबको बनाते हैं। सब कुछ भगवान् हैं। जितनी बातें हमारी धारणा में आती हैं, उनसे परे भी भगवान हैं।
(५) निषेध--  यहाँ की जितनी भी वस्तुएँ हैं, उनके सम्बन्ध में मन को यह सुझाव दीजिये कि वे सभी नश्वर हैं, उनमें से किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता।
(६) धृति (धैर्य)-- कोई भी बात आपको मन के प्रतिकूल दीखे, उसके विषय में आप मन को सुझायें कि यह सारी प्रतिकूलता अनुकूलता में निश्चय ही बदल जायगी।
(७) अधृति-- एक विचार आपके अंदर ऐसा आना चाहिए कि अब हम एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोयेंगे। इतना ही नहीं, खोने पर दुख होना चाहिये। जो समय आपके एवं दूसरों के लिये परिणाम में सुखदायक हो, वही सार्थक है, बाकी सभी निरर्थक है।
(८) लज्जा-- आप से कोई काम ऐसा हो जाय जिससे अपना और दुसरों का अहित होता हो तो उसमें लज्जा का बोध होना चाहिये। यदि कर सकें तो उस भूल को स्वीकार करने का साहस बटोरना चाहिये।
(८) भय-- भय आपको किसी चीज से नहीं होना चाहिये। जब सब जगह भगवान् हैं, सबमें वे ही भरे हैं, सब वे ही बने हैं, तब हमें भय क्यों और किससे होना चाहिये ?
(१०) निश्चय-- ऐसा निश्चय करें कि 'चाहे जो भी हो जाय, मैं मन को भगवान में लगा ही लूँगा--भगवान की कृपाके बल से।'

           प्रातः छः बजे से प्रति तीन घंटे पर कम-से-कम कुछ क्षणों के लिये उपर्युक्त दसों बातों पर विचार करें। ऐसा करनेसे निश्चय ही साधना में प्रगति
होगी।

*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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