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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

                 *६२*

*उठने के लिये तैयार हो जाइये वे उठा लेंगे।*

           जिनसे आपका वास्तविक एवं नित्य सम्बन्ध है, उस सम्बन्ध को एवं उनको तो आप अनादि संस्कारों के कारण अनन्त जन्मों की आसक्ति के कारण गौण बनाये हुए और जो मिथ्या है, खेल का है , जिससे आपका सम्बन्ध कुछ वर्षो से ही है, उसके साथ सम्बन्ध को मुख्य बनाये हुए हैं। कुछ वर्ष पहले न तो आपका नाम था और न इस शरीर से ही आपका सम्बन्ध था। इसके पहले दूसरा नाम था, दूसरा शरीर था। उसके पहले भी दूसरा नाम दूसरा शरीर था। अनन्त जन्मों में अनन्त नामों एवं अनन्त शरीर के साथ आपका सम्बन्ध हुआ है और सबसे वियोग भी। ऐसे ही प्रारब्ध पूरा होते ही इस शरीर एवं इस नाम से भी वियोग निश्चय हो जायगा। आज जैसे उन शरीरके दुःख-सुख से उन शरीरों के नामों के मान-अपमान से उन शरीरों से हुए व्यवहार से आपका तनिक भी सम्बन्ध नहीं वैसे ही इस नाम की प्रशंसा-निन्दा और इस शरीर के सुख-दु:ख से भी तनिक भी सम्बन्ध नहीं रहेगा। जैसे उन अनन्त परिवारों को सुखी बनाने की कल्पना भी आपके मन में अब इस जन्म में नहीं होती, वैसे ही शरीर छूटते ही इस परिवारको भी (यदि पुनर्जन्म हुआ तो) भूल जाइयेगा। फिर इनके लिये व्यग्रता क्यों ? जब यह छूट ही जायेंगे तब इनके लिये इतनी ममता क्यों ? इन वियुक्त होने वाली वस्तुओं ममत्व में फँस कर इनके सुधार-बिगाड से चिन्तित होकर अपने प्राणनाथ प्रभु के ममत्व को क्यों भूलें ? सचमुच इस मोह-राज्य से ऊपर उठना पड़ेगा। जिस उपाय से भी हो, उठना पड़ेगा। आप उठ सकते हैं, आप उनके चरणों को पकड़ कर उठ सकते हैं। इसलिये सच्ची लगन से पूर्ण उत्साह से उठने के लिये तैयार हो जाइये। आप तैयार हुए कि वे उठा लेंगे।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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