63

*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *६३*

*सुख एकमात्र भगवान् में ही है, उन्हीं को पकड़िये*

           संसार में बनना और बिगड़ना नित्य-निरन्तर चलता ही रहता है। जो चीज बनी है, वह नष्ट होगी ही, यह नियम बदलेगा नहीं ; फिर भी मनुष्य इन्हीं को पकड़े रहता है, इतना ही नहीं, तरह-तरह के पाप भी बटोरता रहता है। पाप होनें में मुख्य हेतु यही है कि हमारी विषयों में सुख बुद्धि है। यदि विषयों में से सुख बुद्धि निकल जाय तो फिर पाप हो ही नहीं सकते। बुद्धि उलटी हो रही है, संतों के अनुभूत वचनों पर तथा स्वयं भगवान के वचनों पर विश्वास नहीं होता। संत लोग एक स्वर से यह कह रहे हैं--विषयों को बाहर निकाल फेंको, नहीं तो मारे जाओगे ; पर मन इन बातों को सुनकर भी नहीं सुनता ; क्योंकि यदि वस्तुत: सुनता होता तो फिर विषयों के लिये कामना क्यों होती ? पर मन न माने, तो भी विषयों का मन न दु:खदायी परिणाम तो होकर ही रहेगा। महात्मा लोग उदाहरण देते हैं--एक संत जा रहे थे। रास्ते में पड़ी हुई रुपयों की थैली पर उनकी दृष्टि पड़ गयी। संत बहुत जोर से भागे। वे भागते जा रहे थे कि उन्हें रास्ते में दो सिपाही मिले। संत ने कहा--‘‘भैया! इस रास्ते मत जाओ ; डाइन बैठी है, खा जायगी।’ सिपाहियों ने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया--उनकी बात नहीं मानी। वे दोनों चलते--चलते वहाँ आये जहाँ थैली पड़ी थी। दोनों ने सोचा--'साधु बदमाश था ; वह हम लोगों को धोखा देना चाहता था और स्वयं किसी की सहायता लेकर इस थैली को उठा ले जाने के उद्योग में था। दोनों ने रुपयों को आधा-आधा बाँटना तय कर लिया, पर दोनों ही सोचने लगे कि यदि मैं अकेला होता तो सभी रुपये मुझ को मिल जाते। अब  क्या उपाय करूँ ? दोनों ने ही सोचा--'यदि मेरा साथी किसी प्रकार मर जाय तो सब धन मेरा ही है। एक ने सोचा--बंदूक पास है, गोली भरी है, बस, इसी से इसका काम तमाम कर दूँ। यह सोचकर वह मौका ढूँढने लगा। पास जाने लगा। दूसरे ने सोचा- मैं शहर में जाता हूँ, वहाँ भोजन के लिये मिठाइयाँ लेकर आऊँ और उसी में संखिया मिला दूँ। मैं कह दूँगा कि मैंने खा लिया तुम खा लो। यह सोचकर वह मिठाई लाने चला गया। इधर उसके साथी ने सोचा--बस ठीक है, बंदूक तैयार रखूँगा ; जहाँ सामने दीखा कि गोली दाग दूँगा। उसका साथी मिठाई में संखिया मिलाकर लौटा। इसने उसे देखकर ही गोली दाग दी, वह बेचारा मर गया। यह आनन्द में दूर से हँसने लगा। सोचा--अब क्या है, अब भरपेट भोजन करके यहाँ से चल दूँ। भोजन किया, पर भोजन करते ही संखिये के भीषण जहरसे उसके प्राण भी क्षणों में ही निकल गये। दोनों वहीं मरे पड़े थे, थैली ज्यों-की-त्यों पड़ी रह गयी। थोड़ी देर में संत लौटे। उन्होंने देखा और करुणा भरे स्वर में कहा- ओह ! इन दोनोंको ही यह डाइन खा गयी। 
             यह तो कहानी है, पर असल में संसार में यही हो रहा है। भोग की कामना सभी को नष्ट कर रही है। सुख पाने की आशा से विषयों का संग करते हैं पर परिणाम में मिलता है--दुःख, मृत्यु। मोह इतना बढ़ गया कि जब हम भगवान् को याद करते हैं, तब उनके सामने भी विषयों की ही माँग पेश करते हैं। हम सबकी यही स्थिति है। अतएव हमेशा यह याद रखें--'विषयों में लेशमात्र भी सुख नहीं है, सुख तो एकमात्र भगवान में है।' उन्हीं को पकड़ें। सब छोड़कर भी यदि उन्हें पकड़ सकें, तो अवश्य पकड़ये। बस उनको पकड़ना है, उनमें मनको प्रवेश करा ही देना है, चाहे जिस उपाय से हो। मृत्यु आनेके क्षणतक इसीके लिये चेष्टा करें। इसी के लिये दूसरे सब काम करें।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157