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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

            *६४*

*मोह-राज्य से ऊपर उठनेकी तैयारी कीजिये*

    आप मोह-राज्य से ऊपर उठना चाहते, पर उसके लिये कुछ तैयारी करनी पड़ती है। उस तैयारी का पूर्वरूप क्या है ? इसे सूत्र रूप से इस प्रकार समझना चाहिये---

(१) कामभर बोलने के बाद शेष समय जागने से सोने तक मशीन की तरह जीभ से भगवान का नाम लेते रहें। कम-से-कम बोलकर काम चलाया जाय यह चेष्ठा रहे।

(२)काम की बात सोचने के बाद बाकी समय मन की वृत्तियाँ भी भगवान के चरणों लगी रहें, इसके लिये निरन्तर प्रयत्न होता रहे।

(३) जीवन निर्वाह के लिये जो चेष्टा न्यायतः अभी हो रही है, वह हो, पर कमाई के जो पैसे आये,उनमें ममत्व बिल्कुल न हो। वह इन-इनके भरण-पोषण में लगे, यह आग्रह न हो। दाने के एक-एक कण पर मुहर है। अन्न का जो कण जिसके पेट में जाना है, उसी पेट में विधान के अनुसार जाता है। यह ठीक है कि 'स्टेज मास्टर' ने--जगन्नियन्ता प्रभु ने जिनके भरण-पोषण में निमित्त बनाया है, उनको पहला मौका देने की चेष्टा करें--चेष्ठामात्र, आग्रह नहीं ; पर यदि सात और व्यक्ति आ जायँ तथा आठ-दस व्यक्तियों के लिये भी जो खाद्य-सामग्री मामूली पोषण भरके लिये थी, उसके १७ भाग कर दिये जायँ और इस प्रकार सबका पूरा भरण न होकर आधा ही भरण हो, तो भी चित्त म्लान न होकर विशेष आनन्द का अनुभव करें। ठीक समझें--उन सात व्यक्तियों के रूप में हिस्सा बँटाने वाले स्वयं आपके प्रियतम प्रभु ही हैं, आपकी परीक्षा के लिये आये हैं। अवश्य ही यह भी एक लीला का ही अंग है।

(४) प्रतिकूल-से-प्रतिकूल अर्थात् अत्यन्त प्रतिकूल व्यवहार करने वाले के प्रति भी द्वेष न हो, उसके हृदय में अपने प्राणनाथ प्रभु को देखकर मन-ही-मन हँस दें। बाहर से यदि थोड़ी मलिनता भी दीखे तो आपत्ति नहीं, पर थोड़ी मलिनता का स्पर्श न होने पाये।

(५) प्रत्येक घटना में अपने प्रियतम प्राणनाथ का हाथ है, इसे भीतर अनुभव करें तथा यह अन्तर्हृदय से विश्वास करें कि चाहें कोई घटना कितनी भी भयानक क्यों न हो, उसका परिणाम अनन्त मंगलसे भरा है।

(६) किसीसे भी रूखा नहीं बोलना है। इसका सुधार करने के लिये इससे रूखा व्यवहार आवश्यक है, यह भाव मन से निकाल दें। किसी को आप सुधार सकें तो मधुर शब्दों में ही भले सुधारें, पर कड़ाई मत
करें। कड़ाई न करने से व्यवहार ठीक नहीं होगा--यह भ्रम है ; इसे भी मन से निकाल दें।

(७) मन में यह भाव दृढ़ करते रहें-- 'मेरे तो एक प्रभु ही हैं, और मेरा कुछ नहीं कोई नहीं।' सब प्रभु का, सब प्रभु के--इस नाते से जो सम्बन्ध निभाना हो, भले निभायें ; पर स्वतन्त्र सम्बन्ध जितनी शीघ्रता से हो मन-ही-मन तोड़ डालिये। तोड़ने की चेष्टा करनी ही होगी।
(८) सबसे उत्तम बात तो यह है कि प्रभुसे कुछ भी न माँगें, पर जब मन किसी बात से व्याकुल हो जाय और नीचे गिरने लगे तथा माँगने की इच्छा हो जाय--कोई अभाव मालूम हो और उसकी पूर्ति की उत्कट इच्छा हो, तब सच्चे मन से पूर्ण विश्वास के उनके सामने ही मुँह खोलिये, और किसी भी दूसरे साधन का आश्रय मत लीजिये। सच मानिये, यदि उनसे माँगियेगा तो या तो माँग की पूर्ति हो जायगी, या माँग की पूर्ति हुए बिना आपके मन का दुख मिट जायगा।

           --और भी बहुत-सी बातें हैं, पर यदि उपर्युक्त आठ बातों को ही आप सचमुच पकड़ने की चेष्टा करें तो थोड़े ही दिनों में आप में विलक्षण परिवर्तन हो जायगा।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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