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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *६७*

*आप चाहेंगे उसी दिन,उसी क्षण आपको सर्वत्र भगवान के दर्शन होने लग जायेंगे*

        आप चाहते हैं कि हमारा सर्वत्र भगवद्भाव हो। सच्ची बात तो यह के भगवान के अतिरिक्त कोई वस्तु है ही नहीं, बस सर्वत्र केवल भगवान-ही-भगवान् हैं। पर वे भगवत-रूप में इसलिये नहीं दीखते कि मनुष्य पूरा-का-पूरा भगवद्-रूप में उन्हें देखना नहीं चाहता। सच मानिये, जिस दिन जिस क्षण आपका मन चाहेगा कि मेरी आँखें सर्वत्र भगवान को ही देखें, उसी दिन, उसी क्षण से आपको सर्वत्र भगवान के दर्शन होने लग जायँगे। आप देखना चाहते हैं--सोना, चाँदी, खान-पान की वस्तु, पहनने के कपडे,गप्प लड़ाने वाले मित्र-साथी, सेवा करने वाला नौकर आदि। तब भगवान् सोचते हैं कि मेरा प्यारा भक्त अभी मुझे इन चीजों के रूप में ही देखना चाहता है तो मैं अपना रूप बदल कर उसके चित्त को क्यों दुखाऊँ ? वह चाहता है, सोना-चाँदी आदि देखना तो मैं सोना-चाँदी आदि बनकर ही उसके सामने जाऊँगा। वह भक्त मेरा प्यारा है, मेरे प्यारे को जिस बात में सुख हो, वही मुझे करना है। इसलिये सर्वत्र भगवान्-ही-भगवान् होने पर भी आपको तरह-तरह की चीजें दिखती हैं। ये तब तक दिखती रहेंगी जब तक आप इन्हें देखना चाहेंगे। ये सर्वथा आपके हाथ की बात है। आज आपके मन में केवल मोर मुकुटधारी रूप को देखने की इच्छा जागृत हो जाये तो आज ही ईंट, पत्थर, चूने का अणु-अणु बदलकर श्रीकृष्ण रूप हो जाये। यह सर्वथा ध्रुव सत्य है।

*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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