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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*प्रत्येक प्रतिकूल परिस्थिति में अपने प्रियतम प्रभु का दर्शन करने का अभ्यास कीजिये*
मन में बार-बार सोचते रहिये--मेरा कुछ भी नहीं है, सब कुछ प्रियतम प्रभु का है। सब पर उनका ही अधिकार है। मैं एवं मुझसे सम्बन्ध रखने वाली समस्त चीजें उनकी हैं, वे अपने इच्छानुसार इनका उपयोग
करें--यह भावना जितनी दूर तक दृढ़ होगी, उतनी ही दूर तक आप सांसारिक सुख-दु:ख और सांसारिक चिन्ताओं से अलग हो जाइयेगा। मन में मान रखा है कि अमुक वस्तु मेरी है ; इसीलिये उसके बनने बिगडने की चिन्ता होती है। यदि सचमुच किसी का मन यह स्वीकार कर ले कि यह 'सब उनका है' तो फिर सांसारिक दृष्टि में जो चीज बिगड़ती हुई दीखेगी, उसके सम्बन्ध में भी वह ठीक अनुभव करेगा कि वह बिगड़ नहीं रही है, क्योंकि कोई भी बुद्धिमान अपनी चीज को बिगाड़ता नहीं, नष्ट नहीं करता। यदि बिगाड़ता भी है तो उसका रूप और भी सुन्दर बनाने के लिये बिगाड़ता है। भगवान् तो बुद्धिमानों की बुद्धि की जो चरम सीमा है, उससे भी अनन्तगुना अधिक बुद्धिमान हैं। वे भला व्यर्थ ही अपनी चीज कैसे बिगाड़ेंगे ? वे बिगाड़ नहीं रहे हैं--वे तो बना ही रहे हैं,और भी सुन्दर बना रहे हैं। सच मानिये किसी प्रकार इस वास्तविक स्थिति की एक किरण की भी झाँकी यदि कोई कर पाये तो दुःख उसके जीवन से सदा के लिये नष्ट हो जाता है। जब तक यह अनुभव नहीं हो, तब तक अगणित संतों के अनुभव पर विश्वास करके ऐसी भावना कीजिये कि यहाँ सब मंगल-ही-मंगल हो रहा है। श्रीकृष्ण यदि *मृत्युः सर्वहरश्चाहम्* की घोषणा करते हैं तो विपत्ति जो मृत्यु के ही भाई-बन्धुओं में से एक है, वह भी वे ही हैं। विपत्ति अर्थात् मन के प्रतिकूल परिस्थिति भी श्रीकृष्ण ही हैं। रूप भयानक है, पर यदि पत्नी समझ ले कि मेरे नाथ ही मेरे पास ऐसा रूप धरकर आये हैं तो वह उस समय भी उनका स्वागत करेगी ; क्योंकि पतिव्रता रूप से प्यार नहीं करती,पति से प्यार करती है। अतएव मन के प्रतिकूल किसी भी परिस्थिति में अपने प्रियतम प्रभु का दर्शन करने का अभ्यास कीजिये। वे ही हैं, सचमुच वे ही हैं आपसे अपने को उस रूप में छिपाये हुए आते हैं, इसलिये आप डर जाते हैं। अनन्त संतो की बातें झूठ नहीं हैं, वे त्रिकाल सत्य हैं। आप उस रूप में देखकर उनका स्वागत करें फिर उनसे रहा नहीं जायगा। उस भयावह रूपसे इतने मधुर रूप में परिणित हो जायेंगे कि आप ही हँसने लगियेगा। अभी भी होता तो वही है। संसार में आज तक किसी के जीवनमें ऐसी कोई घटना नहीं हुई जिसका परिणाम मंगलमय नहीं हुआ हो। पर भयानक रूप में जब भगवान का प्रकाश होता, तब लोग रोते हैं ; वही मधुर रूप में परिणित होता है, तब हँसते हैं। पर दोनों समय इस बात को नहीं जानते कि इन दोनों रूपों के भीतर कौन छिपा है। भक्त उसे जानता है और उस छिपे रहने वाले से जो उसका सम्बन्ध है, उसे भी जानता है। इसलिये उसे दु:ख नहीं होता। भोले भक्त डर भी जाते, पर उस समय भी वे अपने स्वामी को ही याद करते हैं, क्योंकि उनकी दृष्टि में उनके लिये और कोई भी सहायक नहीं होता और स्वामी को याद करते ही, भले ही स्वामी अपने विपत्ति की पोशाक तुरंत न बदलें वे मन में ऐसा भाव कर देते हैं, जिससे भय जाता रहता है। अतः किसी भी प्रकार हो, अपने को उनसे जोड़ लें ; जुड़े हुए तो हैं ही, इसे अनुभव करें। वे आपके हैं, आप उनके, उनकी सब चीजें आपकी हैं--आपकी सब चीजें उनकी हैं--इसको मान लें।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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