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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

             *७०*

*मन प्रिया-प्रियतम का धाम बन जाय, यह चेष्टा कीजिये*

         यह सत्य है कि शरीर तो एक दिन जायगा ही ; पर शरीर आपका नहीं है। यह तो प्रिया-प्रियतम की सम्पत्ति है। उन्होंने यह आपको दिया है। यदि आप इसे बना नहीं सकते तो जान-बूझकर बिगाड़ने का अधिकार भी आपको नहीं है। अपनी जान में स्वास्थ्य के नियमों की अवहेलना करना ही इसे बिगाड़ना है। यह नहीं होना चाहिये। साथ में यह भी नहीं होना चाहिये कि शरीर की सेवा में ही मन फँसा रहे। मन तो प्रिया-प्रियतम का धाम बन जाय, यह चेष्टा होनी चाहिये। जिस दिन मन सर्वथा प्रिया-प्रियतम का धाम बन जायगा, उस दिन तो उस शरीर की स्मृति ही मिट जायगी। पर जब तक ऐसा सौभाग्य नहीं होता, तब तक मुख्य वृत्ति भजन की ओर एवं गौणवृत्ति भजन के साधन रूप शरीर की ओर रखकर ही आगे बढ़ना चाहिये। इससे उन्नति ही होगी।

          प्रिया-प्रियतम ने अनन्त दया करके जिन्हें व्रज में निवास दे दिया--समस्त सुख की खान व्रजभूमि जिनको मिल गयी उन्हें चाहिये कि व्रजभूमि में,व्रजराजदुलारे में, वृषभानुदुलारी में मन को रमा दें। सच्ची बात है, व्रज के समान सुख और कहीं भी नहीं है--

कहाँ सुख व्रज कौ-सौ संसार।
कहाँ सुखद बंशीवट जमुना, यह मन सदा विचार।।
कहें बनधाम, कहाँ राधासँग, कहाँ संग ब्रज-बाम।
कहाँ रस-रास बीच अंतर सुख, कहाँ नारि तन ताम।।
कहाँ लता, तरु-तरु प्रति बूझनि, कुंज-कुंज नव धाम।
कहाँ बिरह-सुख बिनु गोपिन सँग ,सूरस्याम मन काम।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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