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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

           *७१*

*शारीरिक सुख एवं नाम की चिन्ता से सर्वथा उपराम हो जाइये*

         बार-बार यह निश्चय करना चाहिये कि इस जीवन को प्रभु चरणों में समर्पित करना है, इसमें इस जीवन की सार्थकता है। अतिशय गम्भीरता से विचारना चाहिये कि भोगों में सुख नहीं, हमें सुख दीखे भले ही पर इनमें सुख की गन्ध भी नहीं है। भगवान स्वयं कहते हैं---

*'ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।'*
              *(गीता ५/२२)*
    
          इस प्रकार बार-बार विचार करके मन जिस जिस विषय की ओर जाये, वहाँ-वहाँ से हटाकर नित्य आनन्दमय प्रभु में लगाना चाहिये। दो बात का मोह मनुष्य को अधिक होता है--पहला शारीरिक सुख का एवं दूसरा
नाम का। शरीर को मनचाहा आराम मिलता रहे एवं लोगों में मेरा पूरा सम्मान हो, खूब आदर हो--ये दो मोह परमार्थ के मार्ग में बढ़ने वाले पुरुषों में भी देखे जाते हैं। पर यदि सचमुच हम लोग थोड़ा विचार करें तो यह ठीक पता चल सकता है कि कितनी अनित्य एवं असार वस्तु लिये हम लोग दुर्लभ मनुष्य जीवन बर्बाद करते हैं। थोड़ी देर के लिये मान लें आपकी लोगों में खूब प्रसिद्धि हुई, लोगों ने आपकी बड़ी तारीफ की, आप बड़े इज्जतदार समझे जाने लगे ; विवाह-शादी में ये बड़े खुले दिल से खर्च करते हैं--इस प्रकार लोगों ने वाहवाही की, ये बड़े विद्वान हैं, व्यवहार-कुशल हैं--इस प्रकार जहाँ भी जायें वहीं प्रशंसा हो, उससे आप भी प्रसन्न हो सकते हैं। लेकिन सोचें--वस्तुतः आपके नाम की तारीफ से आपका क्या बनता है। इसके पहले अनन्त जन्मों में अनन्त नाम आपके हो गये हैं। पता नहीं आपका कितना सुयश गाया जा चुका है, पर आज आपको उनकी स्मृति भी नहीं है। इसी प्रकार मृत्यु इस नाम से भी आपका सम्बन्ध अवश्य ही तोड़ देगी और उस समय आप सर्वथा इस नाम को भूल जाइयेगा। शरीर की भी यही दशा है। इसे कितना भी इसे कितना भी आराम में रखिये पर इससे सम्बन्ध टूटना अनिवार्य है। पहले शरीर था और वह छूटा था। वह सुखसे था अथवा दुःख से था, इस बात को लेकर अब आपको चिन्ता नहीं होती। इसी तरह इस शरीर की भी इसके छूटने के बाद सर्वथा विस्मृति हो जायगी। अतः बुद्धिमानी इसमें है कि इन दोनों वस्तुओं से मन हटाया जाय।

          नाम-रूप के मोह की परिस्थिति संसार में सभी के सामने आती है। आपके सामने भी ऐसी परिस्थितियाँ आती होंगी जिससे आप चिन्तित होते होंगे कि अब तो इज्जत गयी तथा खाने-पीने को भी नहीं रहेगा। आर्थिक प्रश्न को लेकर आपके मन में इस प्रकार की चिंता होनी सम्भव है। तथा कुछ देर के लिए ही सही, भजन को गौण बनाकर,  इज्जत की रक्षा एवं शरीर निर्वाह को मुख्यता देकर उसके लिए चेष्ठा करते होंगे। पर इन परिस्थितियों की उपेक्षा करें। इनमें जरा भी सार नहीं है। बस, जैसा भगवान ने रच रखा है, वह हो जायगा--ऐसा दृढ़ निश्चय एवं विश्वास करके सर्वथा उपराम होकर आत्मा के कल्याण में मन लगाना चाहिये।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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