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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

              *७२*

  *प्रत्येक अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थिति को सहर्ष स्वीकार करें*

         जगत के बहुत थोड़े प्राणी भगवान की दया चाहते है। वे चाहते हैं--अनुकूलता। लेकिन यह बात निरन्तर ध्यान में रखनी चाहिये कि भगवान की दया अनुकूल एवं प्रतिकूल दोनों अवस्था में रहती है। जो केवल चाहते हैं वे भगवान की आधी , आंशिक, असम्पूर्ण दया का ही ग्रहण चाहते है। अत: बुद्धिमानी इसी बात में है कि प्रियतम भगवान् की भेजी हुई प्रत्येक अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थिति को सहर्ष स्वीकार किया जाय। इससे बढ़कर और क्या हो सकता है कि भगवान जब निश्चय दया-ही-दया करेंगे तब हम उनके प्रत्येक विधान के सामने अपना सिर झुका दें। ऐसी बात आचरण में आ जानी अवश्य ही कठिन है किन्तु भगवान की दया का आश्रय लेकर ऐसा बनने की चेष्टा करनी चाहिये। वे दयामय, यदि हमारी नीयत शुद्ध हो तो वे अपनी दया से अवश्य ऐसा भाव बना देंगे।
  
          जहाँ तक बने भगवान का अधिक-से-अधिक नाम लेते रहें। यह अगर होता रहा तो साधन-पथ पर अपने आप बढ़ जाइयेगा। भगवान के नाम की महिमा अनन्त, अपार है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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