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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*७३*
*भगवान का नाम लेते जाइये*
एक लोहा पूजा में राख्यौ, एक घर बधिक परौ ।
पारस गुन-अवगुन नहीं चितवै कंचन करत खरौ।।
इस पद के अर्थ पर विचार कीजिये--पारस स्पर्श होते ही लोहे को सोने में बदल देता है, वह नहीं देखता कि अमुक-अमुक लोहा कहाँ-कहाँ किस-किस उपयोग में आ रहा है। भगवान के नाम की उपमा पारस से दी जाती है। पर मेरी समझ में यह उपमा भगवान के नाम के लिये सर्वथा तुच्छ है ; क्योंकि पारस जड़ पत्थर है तथा भगवान का नाम चिन्मय है। दूसरे नाम और नामी में अभेद हैं। यद्यपि यह बात बहुत आगे चलकर समझ में आती है, तथापि सिद्धान्तत: यह सर्वथा सत्य है कि आपके मुख से निकलता हुआ प्रत्येक नाम आपको भगवान से संयुक्त करा देता है। बीच के कुछ आवरण रहने के कारण ही भगवान के स्पर्श का अनुभव नहीं होता। लोहे का एक गोला पारस को स्पर्श तो करता है, पर लोहे के गोले पर मिट्टी का पर्दा पड़ा हुआ है, प्रत्येक रगड़ में मिट्टी छिलकर गि्र रही है। शुद्ध लोहे के एक कोने को भी मिट्टी रहित होकर निकलने दीजिये फिर तत्क्षण लोहा सोना हो जायगा। अर्थात् नाम स्मरण से आपके अन्तःकरण का मल झर रहा है, शुद्ध हुए अन्तःकरण से जिस दिन एक नाम का भी स्पर्श हुआ कि भगवान् सामने आ जायेंगे। अतः लेते जाइये भगवान का नाम और बिना किसी घबराहट के बढ़ चलिये। प्रभु सहायक हैं।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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