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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

            *७५*

*प्रत्येक प्राणी का प्रारब्ध उसके साथ है*

   बहुत बार आपके मन में यह बात आती होगी--यह कर्तव्य है, इसका पालन करना हमारा धर्म है: अमुक हमारा पुत्र है। इसको सुयोग्य बनाना हमारा धर्म है, हमारे ऊपर इतने प्राणी अवलम्बित है, उन सबका भार हमारे ऊपर है--इस प्रकार कर्तव्य-पालन की चिन्ता मन को अशान्त तथा भजन को गौण बनाती होगी। पर कर्तव्य पालन की चिन्ता से भजन को गौण बनाना भारी भूल है। यह निश्चय समझे कि प्रत्येक प्राणी का प्रारब्ध उसके साथ है, उसे आप घटा-बढ़ा नहीं सकते। अतः उसके लिये चिन्तित होना भूल है। आपका काम इतना ही है कि आप अपने को निमित्त बनाकर सर्वथा शान्त चित्त से सबके लिये हितमूलक चेष्टामात्र करें। होगा तो वही जो भगवान का रचा हुआ है।

*होइहि सोइ जो राम रुचि राखा।*

    'रुचि राखा' से गोस्वामी जु ने स्पष्ट बता दिया है कि सब कुछ पहले से ही तैयार रहता है। फ़िल्म की रील की तरह घूमने की देरी है। रील घूमते ही दृश्य सामने आ जायेगा।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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