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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

           *७९*

*किसी भी सांसारिक उलट-फेर से चित्त को उद्विग्न मत होने दीजिये*

 कर्तव्य का पालन करना अच्छा है ;
         पर जिस कर्तव्य पालन से हम भगवान से विमुख होते हैं, वह कर्तव्य नहीं है ; हमारी आसक्ति वश यह हमें कर्तव्य दीख रहा है। यह कर्तव्यों के जाँच की कसौटी है, अतः इस कसौटी पर जाँच करके ही कर्तव्य पालनमें लगना चाहिये। भूल भी कभी हो सकती,  पर भगवान का आश्रय करके अपनी बुद्धि से बार-बार सोच लेना चाहिये, फिर कृपामय प्रभु सँभाल लेते हैं।

          संक्षेप में, किसी भी सांसारिक उलट -फेर से चित्त को उद्विग्न मत होने दीजिये एवं सांसारिक उन्नति की चेष्टा से सर्वथा उपराम हो जाइये। पेट भरने के लिये भोजन और शरीर ढँकने के लिये वस्त्र की आवश्यकता है, इनके लिये मामूली चेष्टा होनी चाहिये, फिर प्रभु विधान के अनुसार आवश्यकता भर ये दोनों चीजें मिल ही जायेंगी। इस सम्बन्ध में यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि आपको जितनी मिलेगी ठीक-ठीक उतनी की ही आपको आवश्यकता है। आपको यह दीख सकता है कि आवश्यकता से कम मिल रहा है, पर ठीक मानिये कि दयामय प्रभु आवश्यकता से कम नहीं दे सकते।

          शरीर से भी उपराम ही रहना चाहिये। इसका यह अर्थ नहीं है कि भोजन कम हो जाय अथवा जाडे के दिनों में कपड़ा नहीं पहना जाय। यथायोग्य शरीर की सेवा भी होनी चाहिये, पर इसमें मन नहीं फँसे। शरीर में व्याधि हो जाने पर चित्त उद्विग्न होने लगता है, पर ऐसे अवसर पर धैर्य के साथ पीड़ा को सहन करना चाहिये। इससे पूर्व के कर्मों का बोझ कम होगा, आप हल्के होंगें--यह बात तो थोड़ी भी शास्त्र पर श्रद्धा रखने वाला व्यक्ति अनुभव कर सकता है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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