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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ* 

            *८०*

*सुख की भ्रान्ति में जीवन को बर्बाद करना भारी भूल है*

    ऐसा सुंदर मनुष्य जीवन व्यर्थ ना हो जाए, इस विषय में खूब सावधान रहें। वास्तविक सुख की इच्छा जागृत हो इसके लिए बुद्धि पलटने की जरूरत है। पहले मनुष्य को विश्वास करके ही चलना पड़ता है, फिर अनुभव होने पर तो डिगना असंभव है। निश्चित रूप से विश्वास कीजिए-- इस संसार में सुख का लेश भी नहीं है। भगवान को जैसे मानते हैं, मानने की चेष्टा करते हैं, वैसे ही भगवत वचनों को भी मानने की चेष्टा कीजिए--- *'अनित्यमसुखं लोकमिम प्राप्य भजस्व माम्।'* (गीता ६/३३) यह संसार अनित्य है,इसमें सुख है ही नहीं, सुख चाहते हो तो मेरा भजन करो---भगवान के यह वचन मिथ्या ना हुए हैं, ना होंगे। सुख की भ्रान्ति में जीवन को बर्बाद करना भारी भूल है। इससे भारी भूल और हो ही नहीं सकती।

        देह से, परिवार से, जिन्हें भी आप अपना मान कर भगवान को भूल जाते हैं, उन सब से वियोग अनिवार्य है। इसके पहले भी आपका एक परिवार था, पर अब समृति में नहीं है कि उस परिवार के लोगों की दशा क्या है ? बेचारे भूखे भी मर रहे होंगे या मर गए हो तो भी आपको उनकी चिंता नहीं होती। इस प्रकार इन सब को भी आप अवश्य भूल जाएंगे ,इसलिए अभी से उनकी चिन्ता करना छोड़ दीजिए। यह सब प्रभु की सम्पत्ति है। आगे से आगे सबके योगक्षेम का यथोचित प्रबन्ध हुआ है, आप तो निमित्त मात्र बनते हैं। अतएव वे जैसी प्रेरणा करें, उसके अनुसार चलें,पर ध्यान रखें पाप से संयुक्त स्फुरणाओं को उनकी प्रेरणा मत मानियेगा। यदि एक क्षण के लिए भी सत्य का आश्रय परिवार की योग क्षेम के नाम पर आपके द्वारा होता है, तो समझ लें मन धोखा दे रहा है। भूख से तड़प कर मर जाना अच्छा है। इस मृत्यु से अत्यन्त सुंदर भविष्य का निर्माण होगा, पर पाप के द्वारा जीवन निर्वाह की चेष्टा ठीक नहीं है। किसी भी पाप का परिणाम अवश्य ही अशुभ है।

     पैसे का सम्बन्ध पैसे की चाह और पैसे में सुख बुद्धि जब तक है, तब तक बहुत ही सावधान होने की जरूरत है। प्रभु की कृपा का अवलंबन रहे और मुँह से नाम जप निरन्ततर होता रहे, ऐसी चेष्टा करने पर उत्तरोत्तर मन, बुद्धि पवित्र होंगे और तभी जगत में सुख बुद्धि का पूर्णतया अभाव होगा,इसलिए अधिक से अधिक नाम ले।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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