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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*सर्वथा नामके आश्रित हो जाइये*
अनन्त शान्ति मिल जाय,सदाके लिये हम सुखी हो जायँ--इसके लिये अनेक मार्ग हैं; पर उनमें सबसे सुन्दर साधन हैं---भगवान के नाम की निरन्तर रटन। भागवत के द्वितीय स्कन्ध में सबसे पहले शुकदेवजी महाराज अपना हृदय खोलते हुए कहते हैं--
*तन्निर्विद्यामानानामिच्छतामकुतोभयम्।*
*योगिनां नृप निर्णीत हरेर्नामानुकीर्तनम्।।*
(भाग० २/१/११)
'जो लोग संसार में दुःखका अनुभव करके उससे विरक्त हो गये हैं और निर्भय मोक्ष पदको प्राप्त करना चाहते हैं, उन साधकों के लिये तथा योगसम्पन्न सिद्ध ज्ञानियों के लिये भी समस्त शास्त्रोंका यही निर्णय है कि वे भगवान के नामों का प्रेम से संकीर्तन करें।'
इन वचनों पर विश्वास कीजिये और सर्वथा सब प्रकार से नाम के आश्रित हो जाइये। पाप के बुरे संस्कार बाधा देते हैं, इसलिये जैसी चाहिये वैसी रुचि नहीं होती। पर जैसे रोगी दवा समझकर कड़वी दवा का भी सेवन करता है, वैसे ही मन को प्रिय न लगने पर भी हठ से नाम जप करें। जैसे-जैसे पापों के संस्कार मिटेंगे वैसे-वैसे प्रियता बढ़ने लगेगी। बिलम्ब मत कीजिये। इसमें प्रमाद करना बड़ी भारी भूल है। यहाँ की उन्नति अवनति कुछ भी सार नहीं हैं। बहुत दृढ़ होने की जरूरत है अन्यथा पश्चाताप होगा। सब कीजिये ज्यों-का-त्यों ऊपर से रहिये ; पर भीतर से बदल जाइये। यह बात अपने आप होने लगेगी, यदि तत्परता से नाम की रटन होने लगे। अतएव वाणी का पूरा संयम करके आवश्यकता भर बोलने के बाद बाकी कुल समय मशीन की तरह नाम लेने में बीते। इसमें लाभ-ही-लाभ है।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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