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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

          *८२*

*भगवान का भरोसा करके शास्त्र एवं महापुरुषों द्वारा कथित बातों को काम में लाइये*

        अपने प्रिय शिष्य सनातन को शिक्षा देते हुए महाप्रभु चैतन्य ने भगवान के स्वभाव सम्बन्ध में कहा है--

*भक्तवत्सल कृतज्ञ समर्थ वदान्य .......*

         श्रीकृष्ण भक्तवत्सल हैं। जिस प्रकार माता अपने अबोध शिशु की करुण पुकार सुनकर दौड़ पड़ती है, धुल से लथपथ बच्चे के मैलेपन को नहीं देखती, धूल साफ किये बिना ही उसे गोद में उठा लेती है एवं स्तन्यपण कराकर उसे सान्त्वना प्रदान करती है, उसी प्रकार दयामय भक्त की करुण पुकार सुनकर उसकी ओर दौड़ पड़ते, अत्यन्त अधम भक्त की असीम पापराशि की ओर भी नहीं देखते। पाप धोने के पहले उसे अपनी गोद में उठा लेते हैं और अपना चरणामृत पान कराकर उसकी त्रिताप-ज्वाला शान्त कर देते हैं। प्रश्न होता है कि भक्त होने पर तो यह बात है ही किन्तु मैं भक्त कहाँ हूँ ? माँ बच्चे की सच्ची पुकार सुनती है, मैं तो कातरकण्ठ से भगवान् पुकार भी नहीं सकता। मेरी आवाज ही उनके पास कैसे पहुँचेगी ? महाप्रभु कहते हैं वे कृतज्ञ हैं। अवश्य ही तुम्हारी पुकार सच्ची नहीं है उसमें इतना बल नहीं है कि अपनी शक्ति से वह भगवान् को तुम्हारी ओर आकर्षित कर सके, किन्तु वे तुम्हारी प्रत्येक चेष्टा को जानते हैं। तुम्हारी क्षीण-से-क्षीण आवाज भी उनके पास पहुँच जाती है। घबराओ नहीं तुम्हारी यह क्षीण पुकार ही उन्हें बुला लेगी। कोई कह सकता है-- 'भगवान् भक्तवत्सल हैं, कृतज्ञ हैं, किन्तु क्या वे मुझ अनधिकारी को मनोवाञ्छित फल दे सकेंगे ?' इस पर महाप्रभु कहते हैं- वे समर्थ हैं, उनके लिये अधिकारी और अनधिकारी का प्रश्न नहीं बनता।' एक प्रश्न और उठ सकता है भगवान् भक्तवत्सल हैं, कृतज्ञ ,समर्थ, किंतु क्या वे मुझ-जैसे पर भी कृपा दरसा सकेंगे ? इस पर प्रभु कहते हैं-- 'वे वदान्य हैं।' संसार में देखा जाता है कि एक धनी एक गरीब की ओर करुणा भरी दृष्टि रखता है, वह उस गरीब की हालत को भी अच्छी तरह जानता है, उसकी बुरी दशा को दूर करने में भी समर्थ है, किन्तु कृपणतावश गरीब की सहायता नहीं करता। पर भगवान् ऐसे नहीं हैं। वे अपना सर्वस्व तक दे डालते है। उनका प्रतिदान मामूली नहीं है। शास्त्र का वचन है--

*तुलसीदलमात्रेण जलस्य चुलकेन च।*
*विक्रीणीते स्वमात्मानं भक्तेभ्यो भक्तवत्सल:।।*

   महाप्रभु की यह शिक्षा ध्यान में रखनी चाहिए। कोई विश्वास करे चाहे नहीं, किन्तु शास्त्र की, महापुरुषों की उक्तियाँ बिल्कुल उसी रूप में ठीक होती हैं, जिस रूप में कही गयी हैं। श्रद्धा नहीं रहने के कारण ही मनुष्य दु:ख उठाता है। श्रद्धा न भी हो तो भी भगवान का भरोसा करके शास्त्र एवं महापुरुषों द्वारा कथित बातों को काम में लाना चाहिए। वस्तु गुण अन्त में अपने आप श्रद्धा पैदा कर देगा।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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