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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
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*महायात्रा का सच्चा पाथेय है--भगवद्भजन*
उस दिन हठात् ............ के जीवन का अन्त हो गया। पता नहीं वे इस समय कहाँ होंगे। परंतु इतना तो हम सभी के लिये प्रत्यक्ष है कि यहाँ की किसी भी वस्तु से अब उनका कोई सम्बन्ध नहीं रहा। अब वे मात्र इने-गिने अपने कुछ सम्बन्धियों की स्मृति के विषय रह गये हैं। समय इस स्मृति को भी दूर कर देगा। यही दशा हम सबकी होने वाली हैं। यह बिल्कुल निश्चित है कि एक यहाँ दिन हमारा भी यहाँ से, यहाँ से सम्बन्धित व्यक्तियों से, के कार्य-कलाप से इतना ही नहीं, यहाँ के किसी भी पदार्थसे बिल्कुल ही सम्बन्ध नहीं रहेगा। इस प्रकार यदि हम विचार करें तो वास्तवमें इस जगत में न तो कोई किसी का मित्र है न कोई किसी का शत्रु है, न कोई अपना है न कोई पराया है। जिसको भगवान ने जो अभिनय करने का भार सौंपा है, वह वही कर रहा है। भ्रमवश हम लोग इस खेल के रहस्य को न जानकर दुख उठा रहे हैं। कोई जान ही नहीं सकता, यह भी एक भगवान् की लीला ही है उसे जिसे भगवान जनाना चाहते, वहीं जान पाता है और उसे फिर किसी प्रकार का दुख नहीं रहता। अनेक महात्मा ने इसका अनुभव किया था। आज भी जो महापरुष हैं वे ऐसा अनुभव करते हैं प्रश्न है-ऐसी स्थिति में क्या किया जाय ? इसका उत्तर संक्षेप में यही है कि इस-प्रपञ्च के सूत्रधार श्रीकृष्ण की शरण ली जाय। फिर तो जो कुछ उचित अभिनय करना होगा, वे करायेंगे और हम लोग उन्हें देख-देखकर मुग्ध हो रहेंगे। सार बात इतनी ही है कि आप सचमुच जी-जान से वर्तमान प्रपञ्चिक जगत से मन को हटाने की चेष्टा करें। यहाँ की अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों में कुछ रक्खा नहीं है। आवश्यकता है यावन्मात्र पदार्थों से ममता
हटाकर भगवान में ममता करने की। इसी में बुद्धिमानी है। स्मरण रखें--सबके लिये समय निश्चित हो चुका है जबकि सबको सब कुछ छोड़कर चला जाना होगा। उस यात्रा में सच्चा पाथेय है--भगवद्भजन बस, इसको मुख्य कर लें, और सबको गौण।
आप इतना विश्वास कर लें--'जब मैंने कम-से-कम वाणी के ही द्वारा भगवान की शरण ले ली है, तब चिन्ता का पात्र कैसे हो सकता हूँ। अब भगवान् मुझ पर दया करके एक दिन अपनी असीम अनुकम्पा का अनुभव अवश्य करा देंगे ही।' जीवन में बहुत-से नाजुक अवसर आते हैं और मनुष्य विपत्तियों से घबराकर भगवान पर विश्वास शिथिल कर लेता है, पर उसके विश्वास शिथिल करने पर भी जो वस्तुस्थिति है, उसमें थोड़े ही हेर-फेर होगा । आप अच्छी तरह विश्वास कर लें कि जिस सूर्य में यह शक्ति नहीं है कि वह किसी को अन्धकार का दान कर सके, उसी तरह भगवान में यह शक्ति नहीं कि वे किसी पर अकृपा कर सकें। यह बात विनोद की-सी है, किंतु भगवत्कृपाको किसी अंशमें समझाने के उद्देश्य से लिखी गयी है। दयामय का कोई भी विधान मंगल से रहित हो ही नहीं सकता। मंगलमय से निकली चीज अमंगल कैसे हो सकती है। सम्भव है, आपके सामने लौकिक दृष्टि से ऐसी परिस्थिति आ जावे, जब आपको दर-दर का भिखारी बन मारा मारा फिरना पड़े। लेकिन भगवान के भीषण विधान में क्या है, आप जानते हैं ? अगर आपको समझ भी आ जाये तो दुख नहीं होगा। देखें, यदि ऐसा हुआ तो समझना चाहिए कि जगन्नियन्ता के पास पहुँचने में अब आपको विलम्ब नहीं है। हम देखते हैं---भूल से मनुष्य अत्यन्त भयानक चीज को सुखदायक समझकर उसे पाना चाहता है, किंतु दयामय का विधान कुछ ऐसा होता है कि मनुष्य अपने प्रयत्न में सफल नहीं हो सकता। भगवान् उसकी तरह अबोध नहीं हैं कि उसे मनचाही वस्तु देकर उसका जीवन बर्बाद कर दें। अतएव--जाही विधि राखे राम ताही विधि रहिये अपना योग-क्षेमका भार जगनियन्ता हाथ सौंपकर सदा के लिये निश्चिन्त हो जाइये। लोगोंकी दृष्टिमें दीन-हीन होने पर भी आप शाहंशाह रहेंगे।
*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
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