85

*आस्तिकता की आधारशिलाएँ*

          *८५*

*एक ही बात*

   एक ही बात है---नाम-जप करें। अन्तःकरण पवित्र करने कि, भगवत दया अनुभूति करने की इससे सुलभ और शीघ्र फलप्रद साधन मेरी दृष्टि में और नहीं है।

*जब भगवान्का आह्वान होता है, तभी भजन की ओर प्रवृत्ति होती है।*

श्रीशुकदेवजी कहते हैं -

*समाश्रिता ये पदपल्लवप्लवं महत्पदं पुण्ययशोमुरारे:।*
*भवाम्बुधिर्वत्सपदं परं पदं पदं पदं यद् विपदां न तेषाम्।।*
           (श्रीमद्भा० १०/१४/५८)

      'जिन्होंने पुण्यकीर्ति भगवान श्रीकृष्णचन्द्रके चरणकमलरूप नौकाकी, जो महापुरुषों का आश्रयरूप है, शरण ली है, उनके लिये यह संसार-समुद्र बछडे के खुरके समान हो जाता है और उन्हें परमपद की प्राप्ति हो जाती है। जो विपत्तियों का पद है, उस संसार में उन्हें कभी नहीं आना पड़ता।'

   आप कहेंगे, ‘हम लोग तो समाश्रित नहीं हैं। बिल्कुल ठीक है। किंतु एक बात ध्यान में रखियेगा। यदि आपके जीवन में  ‘समाश्रित' होना नहीं होता तो आप भजन की ओर लगते ही नहीं। जब भगवान का आहान होता है, तभी भजन की ओर प्रवृति होती है। उनका यह आवाह्न पूर्ण होता है। एक समय ऐसा आयेगा, जब वे आपको 'समाश्रित' कर लेंगे। यह केवल किताबी बात नहीं ध्रुव सत्य है।

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

Comments

Popular posts from this blog

92

90

157