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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

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*व्यावहारिक जगत में भगवान को साथ रखिये*

          भगवान में विश्वास की कमी के कारण, दूषित वातावरण का असर पडने के कारण एवं पूर्व के संस्कारों के कारण बहुत बार हम लोगों के मन में परिवार को लेकर चिन्ताएँ आ सकती हैं। उस समय जगत का महत्व भगवान की अपेक्षा अधिक हो जाता है। वस्तुतः जागतिक चिन्ता तभी आती, जब भगवान गौण हो जाते हैं और जगत् प्रधान। इसलिये खूब सावधान रहना चाहिये कि एक क्षण के लिये भी भगवान गौण नहीं होने पायें। आप विश्वास रक्खें कि जैसे-जैसे भगवान् मुख्य उद्देश्य होते जायेंगे वैसे-वैसे यह चिन्ता हटती जायगी। एक बात और है--साधना मार्ग में खासकर भगवत्-शरणागति में किसी भी जागतिक चिन्ता को मन में स्थान ही नहीं देना चाहिये। यदि हम भगवान के हो गये, नहीं, सदैव ही भगवान के थे, हैं और रहेंगे तो हमसे सम्बद्ध यावन्मात्र पदार्थ भी भगवान के ही हैं। क्या भगवान को अपनी चीजों का ध्यान नहीं है ? क्या हम उनसे ज्यादा चतुर एवं बुद्धिमान हैं, जो उनकी अपेक्षा भी अधिक अच्छी तरह किसी चीज की संभाल करेंगे ? वस्तुतः सच्ची बात तो यह है कि जो दयामय भगवान की ओर की सँभाल है, वही सच्ची सँभाल है। हम तो मूर्खतावश सँभालने के लिये जाकर बिगाड़ ही सकते हैं, किंतु भगवान से कभी भूल होती नहीं। इसलिये जब कभी स्त्री, पुत्र,परिवार, धन, मान, प्रतिष्ठा आदि को लेकर मन चिन्तित होने लगे, उस समय विचार करना चाहिये कि 'मैं तो प्रभु का हूँ; ये सब चीजें भी उन्हीं की हैं। सारे जगत की सम्पूर्ण दया इकट्ठी करने पर भी भगवान की दया की एक बूँद के बराबर भी नहीं है। वे भगवान क्या हमारा अमंगल करेंगे ? कभी नहीं, इसमें ही हमारा मंगल है। हमारा सब कुछ उन्हीं का है, वे अपनी चीज को जैसा रखना चाह रहे हैं वही ठीक है। देखें भगवान की भक्ति केवल मानसिक प्रक्रिया ही नहीं है, यदि यह क्रिया रूप में न आयी तो भक्ति में कमी है। यद्यपि आधुनिक जमाने में यह कम देखने को मिलता है, किंतु जितने भी ऊँचे-ऊँचे भक्त हुए हैं,सबने व्यावहारिक जगत में भगवान को साथ रखा है। गीताप्रेस से प्रकाशित भक्त-गाथाएँ पढ़िये। आप देखेगें कि किस प्रकार भगवान् के विश्वासी भक्तों ने अपने आप व्यावहारिक जीवन में भगवान की दया का पद-पद पर अनुभव किया है। भक्त गिरिवर एवं भक्त प्रतापराय की जीवनी पढ़कर मैं तो रोने लग जाता हूँ।

         सारांश यह है कि जगत की अनुकूल एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को लेकर व्यस्त होने की आवश्यकता नहीं है। भगवान के प्रत्येक विधान को मंगलमय देखने की चेष्टा करें। यह बात मानने की ही नहीं है, वस्तुतः ऐसी ही बात है। भगवान का भयंकर विधान अनन्त आनन्द से ओत-प्रोत रहता है। अन्त:करण शुद्ध होने पर मनुष्य बिल्कुल इसी प्रकार अनुभव करता है। समय-समय पर भक्त-गाथाओं को पढ़ते रहना चाहिये। वे कथाएँ कल्पना नहीं हैं, वास्तविक हुई घटनाएँ हैं। वे अन्तःकरण को पवित्र करेंगी, उनसे बहुत आत्मबल बढ़ेगा—यह मेरा अपना खास अनुभव है। मुझे इन भक्त-गाथाओं के पढ़ने से अत्यधिक लाभ हुआ है।

          अन्तिम बात यह है कि किसी भी परिस्थिति में घबराइये नहीं। कृपामय को, आप जितनी कल्पना भी नहीं कर सकते उससे अधिक आपका ध्यान है।

*परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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