97
*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*
*९७*
*हम सुख-दुख के भोग में सर्वथा परतन्त्र हैं*
मनुष्य कल्पना के राज्यों ही विचरा करता है किंतु इस बात को भूल जाता है कि इस जागतिक कल्पना का कोई मूल्य नहीं है। वह अगर थोडा भी ध्यान दे तो उसे पता लग सकता है कि सुख-दुख भोग में वह सदा परतन्त्र है। भले ही निमित्त कुछ बने, किंतु ये किसी अचिन्त्य-शक्ति के नियमन में स्वयं जाकर प्राप्त हो जाते हैं। भैया ! यह समझना कठिन है, किन्तु बिल्कुल ठीक है कि इसमें किसी प्रकार की शंका की गुंजाइश नहीं है। यह कानून है--
'जो कछु रचि राख्यो नन्दनन्दन मेटि सके नहेि कोय।'
यदि आप यह समझ लें तो फिर आपको दुख हो ही नहीं।
*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*
Comments
Post a Comment