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*आस्तिकता की आधार-शिलाएँ*

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*सब होते हुए भी दयामय की कृपा का पलड़ा ही भारी रहेगा*

            एक बात हमेशा ध्यान में रखने की है कि हम कितना भी क्यों न चाहें, किन्तु हमारा जो संकल्प भगवान की इच्छा से समन्वित नहीं होगा, वह कभी पूरा हो नहीं सकता। अत: जब कोई हमारी धारणा के प्रतिकूल बात आकर प्राप्त हो तो विश्वास कर लेना चाहिये कि प्रभु की इच्छा से ही ऐसा हुआ है। अवश्य ही व्यवहार में प्रतिकूल परिस्थिति प्राप्त होने पर ऐसा मन हो जाना कठिन है,किंतु भगवत दया का आश्रय करके यदि आप चेष्टा करेंगे तो ऐसा हो जाना कोई बड़ी बात नहीं हैं। यह केवल हम मानते हों, ऐसी बात नहीं है। वस्तुत: यह सिद्धान्त है कि जो कुछ भी प्रतिकूलता प्राप्त होती है, उसमें भी श्री कृपामय भगवान का हाथ है और उसका परिणाम मंगल ही होगा। अगर किसी प्रकार मनुष्य यह विश्वास कर सके तो उसकी सारी चिन्ता घट जाय और फिर उसके द्वारा केवल भजन होगा। देखें मनुष्य के न चाहने पर भी प्रतिकूलता तो आती ही है। प्रारब्ध में यदि प्रतिकूलता है तो आकर ही रहेगी। फिर उसके लिये चिन्ता करना व्यर्थ है।

          मेरे मनमें आप सबके लिये यही भाव उत्पन्न होता है कि जिनकी अहेतुकी कृपा से आप लोगों की इस ओर प्रवृत्ति हुई है, वे ही भगवान् शेष बचा हुआ कार्य भी आपके द्वारा पूरा करवा लेंगे। देखें, हम लोगों में अनन्त त्रुटियाँ हैं। यह बात बिल्कुल ठीक है कि हम लोग अभी पग-पग पर फिसल जाते हैं बहुत मामूली जागतिक प्रलोभन ईश्वर की अपेक्षा अधिक आकर्षक सिद्ध है। यह बात होते हुए भी दयामय की कृपा का पलड़ा ही भारी रहेगा और हम लोग सभी उस कृपा का सहारा लेकर इस भव-समुद्र से तर जायेंगे; केवल तरेंगे ही नहीं, उनका दिव्य प्रेम प्राप्त करेंगे।

         भगवान हमें जैसे रखना चाहते हैं, उसी प्रकार रहकर जीवन बिताते चलें, जितनी तत्परता से ले सकें, उतनी तत्परतासे अधिक-से-अधिक उनका नाम लेते रहें। वस्तुतः हम कलयुगी प्राणियों से प्रभु और कुछ आशा रखते भी नहीं। सारी कमी वे पूरी कर देंगे, यह विश्वास रखें--- *योगक्षेमं वहाम्यहम्।*

*।। परम पूज्य श्रीराधाबाबा जू ।।*

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